समास का सामान्य परिचय



👉 व्युत्पत्ति और अर्थ: 'सम्' उपसर्ग, 'अस्' धातु और 'घञ्' प्रत्यय के मिलने से समासः पद निष्पन्न होता है। इसका सीधा अर्थ संक्षिप्तीकरण या पदों को संक्षिप्त करना होता है।

👉 पारिभाषिक सूत्र: व्याकरण शास्त्र में कहा गया है — "अनेकपदानां एकपदीभवनं समासः" अर्थात जब बहुत से पद मिलकर एक पद का रूप ले लेते हैं, तो उसे समास कहते हैं। एक अन्य मत के अनुसार "समसनं समासः" ही इसकी मूल पहचान है। सरल शब्दों में, जब दो या दो से अधिक सुबंत पद अपनी-अपनी विभक्तियों को त्यागकर एक नए स्वतंत्र सार्थक पद का निर्माण करते हैं, तो वह समास कहलाता है।


विग्रह 

👉सामासिक पद के अर्थ को खोलने या वाक्य के रूप में अलग करके दिखाने की क्रिया को विग्रह कहते हैं। इसके दो मुख्य भेद हैं:

👉 लौकिक विग्रह: जो लोक-व्यवहार या सामान्य भाषा में समझने के लिए प्रयुक्त वाक्य होता है, जैसे — कृष्णस्य समीपम्।

👉 अलौकिक विग्रह: जो विशुद्ध रूप से व्याकरण की प्रक्रियाओं, प्रकृति और प्रत्ययों को दर्शाने के लिए किया जाता है, जैसे — कृष्ण + ङस् + उप।


समास के प्रमुख भेद

👉 लघुसिद्धान्तकौमुदी जैसे मूल ग्रंथों में समास के मुख्यतः 5 भेद बताए गए हैं, परंतु व अन्य शिक्षक भर्ती परीक्षाओं के दृष्टिकोण से समास के 6 मुख्य भेद स्वीकार किए जाते हैं:

   1. अव्ययीभाव समास

   2. तत्पुरुष समास (इसी का उपभेद कर्मधारय है)

   3. कर्मधारय समास (इसी का उपभेद द्विगु है)

   4. द्विगु समास

   5. द्वन्द्व समास

   6. बहुव्रीहि समास


अव्ययीभाव समास 

👉 पहचान सूत्र: "प्रायेण पूर्वपदप्रधानोऽव्ययीभावः"

👉 मौलिक नियम: जिस समास में पूर्वपद (पहला पद) प्रधान होता है और वह कोई अव्यय या उपसर्ग होता है, तथा उत्तरपद (दूसरा पद) कोई संज्ञा शब्द होता है, उसे अव्ययीभाव समास कहते हैं। समास होने के बाद पूरा सामासिक पद अव्यय बन जाता है और नियमतः हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में ही रहता है।


📌 प्रमुख अव्यय विग्रह सूत्र (अर्थों में):

पाणिनीय सूत्र "अव्ययं विभक्ति-समीप-समृद्धि..." (2.1.6) के अनुसार समर्थ सुबंत पदों का निम्नलिखित 16 अर्थों में अव्ययीभाव समास होता है। इनके परीक्षा-विशेष उदाहरण इस प्रकार हैं:

✨ विभक्ति के अर्थ में: 'हरौ इति' का सामासिक पद अधिहरि बनता है, जिसका अर्थ 'हरि में' होता है।

✨ समीप (पास) के अर्थ में: 'कृष्णस्य समीपम्' का सामासिक पद उपकृष्णम् (कृष्ण के पास) और 'गङ्गायाः समीपम्' का उपगङ्गम् (गंगा के पास) बनता है।

✨ समृद्धि के अर्थ में: 'मद्रणाम् समृद्धिः' का सामासिक पद सुमद्रम् (मद्र देश की समृद्धि) बनता है।

✨ व्यृद्धि (नाश या पतन) के अर्थ में: 'भिक्षूणाम् व्यृद्धिः' का सामासिक पद दुर्भिक्षम् (भिक्षा की कमी या अकाल) बनता है।

✨ अर्थाभाव (अभाव या कमी) के अर्थ में: 'मक्षिकाणाम् अभावः' का सामासिक पद निर्मक्षिकम् (मक्खियों का अभाव) और 'विघ्नानाम् अभावः' का निर्विघ्नम् (बाधाओं का अभाव) बनता है।

✨ अत्यय (बीत जाना या नाश) के अर्थ में: 'हिमस्य अत्ययः' का सामासिक पद अतिहिमम् (बर्फ का बीतना) बनता है।

✨ असम्प्रति (इस समय उचित न होना) के अर्थ में: 'निद्रा सम्प्रति न युज्यते' का सामासिक पद अतिनिद्रम् (अब सोना ठीक नहीं है) बनता है।

✨ शब्दप्रादुर्भाव (प्रसिद्धि या प्रकट होना) के अर्थ में: 'हरि शब्दस्य प्रकाशः' का सामासिक पद इतिहरि बनता है।

✨ पश्चात् (पीछे) के अर्थ में: 'विष्णोः पश्चात्' का सामासिक पद अनुविष्णु (विष्णु के पीछे) बनता है।


 यथा (इसके 4 प्रमुख उपभेद हैं): 

1. योग्यता: 'रूपस्य योग्यम्' का सामासिक पद अनुरूपम् (रूप के अनुसार) बनता है।

   2. वीप्सा (दुहराव): 'दिनं दिनं प्रति' का सामासिक पद प्रतिदिनम् (हर दिन) और 'अर्थं अर्थं प्रति' का प्रत्यर्थम् बनता है।

   3. पदार्थानतिवृत्ति (सीमा): 'शक्तिम् अनतिक्रम्य' का सामासिक पद यथाशक्ति (शक्ति के अनुसार) बनता है।

   4. सादृश्य: 'हरेः सादृश्यम्' का सामासिक पद सहरि (हरि के समान) बनता है।

✨ आनुपूर्व्य (क्रम के अनुसार) के अर्थ में: 'कनिष्ठस्य या ज्येष्ठस्य आनुपूर्व्येण' का सामासिक पद अनुज्येष्ठम् (क्रम के अनुसार) बनता है।

✨ यौगपद्य (एक साथ) के अर्थ में: 'चक्रेण युगपत्' का सामासिक पद सचक्रम् (चक्र के साथ) बनता है।

✨ सादृश्य (समानता/गुण) के अर्थ में: 'सदृशः सख्या' का सामासिक पद ससखि (मित्र के समान) बनता है।

 ✨सम्पत्ति के अर्थ में: 'क्षत्राणाम् सम्पत्तिः' का सामासिक पद सुक्षत्रम् (क्षत्रियों की सम्पत्ति) बनता है।

✨ साकल्य (पूर्णता या सब कुछ) के अर्थ में: 'तृणम् अपि अपरित्यज्य' का सामासिक पद सतृणम् (तिनके को भी बिना छोड़े) बनता है।

✨ अन्त (समाप्ति) के अर्थ में: 'अग्निग्रन्थपर्यन्तम्' का सामासिक पद साग्नि (अग्नि ग्रन्थ के अंत तक) बनता है।


🖇️🖇️ विशेष अपवाद नियम — नदीभिश्च सूत्र:🖇️🖇️


👉 नियम: सूत्र "नदीभिश्च" (2.1.20) के अनुसार जब कोई संख्यावाचक शब्द किसी नदी विशेष के नाम के साथ जुड़कर समाहार (समूह) का बोध कराता है, तो वहाँ द्विगु समास न होकर अनिवार्य रूप से अव्ययीभाव समास माना जाता है।

👉 उदाहरण: 'पञ्चानां गङ्गानां समाहारः' का सामासिक पद पञ्चगङ्गम् (पाँच गंगाओं का समूह) और 'द्वयोः यमु

नयोः समाहारः' का द्वियमुनम् (दो यमुनाओं का समूह) बनता है।