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 26. कारक 

👉परिभाषा: वाक्य में जिस शब्द का क्रिया के साथ सीधा संबंध होता है, उसे कारक कहते हैं। संस्कृत व्याकरण के अनुसार— "क्रियाजनकत्वं कारकत्वम्" अर्थात् जो क्रिया को उत्पन्न करता है या पूरा करता है, वही कारक है।

👉संख्या: संस्कृत में केवल 6 कारक माने जाते हैं। संबंध और संबोधन को कारक नहीं माना जाता क्योंकि इनका क्रिया से सीधा जुड़ाव नहीं होता।


✨कारकों के नाम और उदाहरण:

   1. कर्ता कारक (कार्य को करने वाला) — उदाहरण: अमितः लिखति (अमित लिखता है)।

   2. कर्म कारक (जिस पर क्रिया का फल पड़े) — उदाहरण: सः चित्रं पश्यति (वह चित्र देखता है)।

   3. करण कारक (जिस साधन से कार्य किया जाए) — उदाहरण: छात्राः हस्तेन लिखन्ति (छात्र हाथ से लिखते हैं)।

   4. सम्प्रदान कारक (जिसके लिए कुछ दिया या किया जाए) — उदाहरण: माता बालकाय दुग्धं ददाति (माता बालक को दूध देती है)।

   5. अपादान कारक (जिस स्थान या वस्तु से कोई अलग हो) — उदाहरण: पत्राणि वृक्षात् पतन्ति (पत्ते पेड़ से गिरते हैं)।

   6. अधिकरण कारक (जो क्रिया के होने का आधार या स्थान हो) — उदाहरण: मीनाः जले वसन्ति (मछलियाँ जल में रहती हैं)।


27. विभक्तियाँ 

👉परिभाषा: जिन प्रत्ययों या विशेष चिह्नों से शब्दों की संख्या (वचन) और उनके कारकों की स्थिति स्पष्ट होती है, उन्हें विभक्ति कहते हैं।

👉संख्या: संस्कृत में कुल 7 विभक्तियाँ होती हैं:

👉प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, षष्ठी, सप्तमी।

👉विशेष नियम: संबोधन में हमेशा प्रथमा विभक्ति के ही रूपों का प्रयोग किया जाता है।

28. पुरुष 

👉संस्कृत व्याकरण में बातचीत के संदर्भ और कर्ता की स्थिति को स्पष्ट करने के लिए 3 पुरुष होते हैं:

   1. प्रथम पुरुष (अन्य पुरुष): जिसके बारे में कोई बात की जा रही हो (थर्ड पर्सन)।

   ✨उदाहरण: सः (वह), तौ (वे दोनों), ते (वे सब) या किसी का नाम जैसे— केशवः धावति (केशव दौड़ता है)।

   2. मध्यम पुरुष: जिससे सीधे बात की जा रही हो (सुनने वाला या सेकंड पर्सन)। इसके कर्ता निश्चित हैं: त्वम् (तुम), युवाम् (तुम दोनों), यूयम् (तुम सब)।

   ✨उदाहरण: त्वं कुत्र गच्छसि? (तुम कहाँ जाते हो?)

   3. उत्तम पुरुष: जो स्वयं बात कह रहा हो (बोलने वाला या फर्स्ट पर्सन)। इसके कर्ता निश्चित हैं: अहम् (मैं), आवाम् (हम दोनों), वयम् (हम सब)।

   ✨उदाहरण: अहं विद्यालयं गच्छामि (मैं विद्यालय जाता हूँ)।

  

29. वचन 

👉परिभाषा: संज्ञा, सर्वनाम या क्रिया के जिस रूप से उसकी संख्या का बोध होता है, उसे वचन कहते हैं।

👉संख्या: संस्कृत में 3 वचन होते हैं:

1. एकवचन: किसी एक व्यक्ति या वस्तु का बोध कराने वाला। उदाहरण: अश्वः (एक घोड़ा), कन्यका (एक लड़की), पुष्पम् (एक फूल)।

2. द्विवचन: ठीक दो व्यक्तियों या वस्तुओं का बोध कराने वाला। उदाहरण: अश्वौ (दो घोड़े), कन्यके (दो लड़कियाँ), पुष्पे (दो फूल)।

3. बहुवचन: तीन या तीन से अधिक संख्याओं का बोध कराने वाला। उदाहरण: अश्वाः (कई घोड़े), कन्यकाः (कई लड़कियाँ), पुष्पाणि (कई फूल)।


30. लिङ्ग 

👉परिभाषा: शब्द के जिस रूप से उसके पुरुष जाति, स्त्री जाति या किसी स्वतंत्र (जड़) पदार्थ होने की पहचान हो, उसे लिङ्ग कहते हैं।

👉संख्या: संस्कृत में 3 लिङ्ग होते हैं:

1. पुल्लिङ्ग: पुरुष जाति का बोध कराने वाले शब्द। उदाहरण: गजः (हाथी), वृक्षः (पेड़), अनिलः (हवा)।

2. स्त्रीलिङ्ग: स्त्री जाति का बोध कराने वाले शब्द। उदाहरण: मक्षिका (मक्खी), कलिका (कली), नदी।

3. नपुंसकलिङ्ग: जो शब्द न पुरुष जाति के हों और न स्त्री जाति के (अचेतन या जड़ पदार्थ)। उदाहरण: वस्त्रम् (कपड़ा), गृहम् (घर), जलम् (पानी)।


31. लकार 

👉परिभाषा: क्रिया के होने के समय (काल) और उसकी मानसिक दशा या अवस्था (जैसे आज्ञा, इच्छा आदि) को अलग-अलग रूपों में प्रकट करने के माध्यम को लकार कहते हैं।

👉संख्या: संस्कृत में कुल 10 लकार होते हैं:

1. लट् लकार: वर्तमान काल

2. लिट् लकार: परोक्ष भूतकाल (ऐसी घटना जो बहुत पहले घटी हो और आँखों के सामने न हो)

3. लूट् लकार: अनद्यतन भविष्यत् काल (आज के दिन को छोड़कर आगे आने वाला भविष्य)

   4. लृट् लकार: सामान्य भविष्यत् काल 

   5. लेट् लकार: इसका प्रयोग केवल वेदों (वैदिक संस्कृत) में होता है, लौकिक संस्कृत में नहीं।

   6. लोट् लकार: आज्ञा, अनुमति, प्रार्थना या आशीर्वाद के अर्थ में।

   7. लङ् लकार: अनद्यतन भूतकाल (जो समय आज से पहले बीत चुका हो)।

   8. विधिलिङ् लकार: चाहिए, सलाह या संभावना के अर्थ में।

   9. आशीर्लिङ् लकार: विशेष रूप से आशीर्वाद या शुभकामना देने के लिए।

   10. लुङ् लकार: सामान्य भूतकाल।

   11. लृङ् लकार: हेतुहेतुमद्भाव (शर्तिया भूतकाल— जहाँ एक क्रिया का होना दूसरी क्रिया पर निर्भर करता हो)।


(ध्यान दें: विधिलिङ् और आशीर्लिङ् दोनों 'लिङ् लकार' के ही दो भेद हैं, इसलिए मूल रूप से लकारों की संख्या 10 ही मानी जाती है।)


32. धातुसंज्ञा और गण 

👉धातुसंज्ञा: क्रियाओं के सबसे मूल या शुरुआती रूप को धातु कहते हैं। महर्षि पाणिनि के व्याकरण के अनुसार "भूवादयो धातवः"  सूत्र से इनकी धातु संज्ञा होती है। पाणिनि की धातुपाठ पुस्तक में इनकी कुल संख्या लगभग 1970 (मोटे तौर पर 2000) बताई गई है।

👉धातुओं के रूप: धातुओं के रूप तीन प्रकार से चलते हैं:

1. परस्मैपदी (जैसे: पठति, पठतः, पठन्ति)

   2. आत्मनेपदी (जैसे: लभते, लभेते, लभन्ते)

   3. उभयपदी (जो परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों में चलती हैं, जैसे: जानाति, जानीतः, जानन्ति / जानीते...)

👉गण (धातुओं के विभाग): संस्कृत की सभी धातुओं को उनकी बनावट और प्रत्यय जुड़ने के नियमों के आधार पर 10 गणों (वर्गों) में विभाजित किया गया है:- 

1. भ्वादिगण

✨धातुओं की संख्या: 1035 धातुएँ

  ✨उदाहरण और अर्थ: भू (होना), पठ् (पढ़ना), चल् (चलना), हस् (हँसना)

2. अदादिगण

✨धातुओं की संख्या: 72 धातुएँ

   ✨ उदाहरण और अर्थ: अद् (खाना), अस् (होना), ब्रू (बोलना), या (जाना)

 3. जुहोत्यादिगण

✨धातुओं की संख्या: 24 धातुएँ

  ✨ उदाहरण और अर्थ: hu (हवन करना), दा (देना), धा (धारण करना), भी (डरना)

4. दिवादिगण

✨धातुओं की संख्या: 140 धातुएँ

  ✨उदाहरण और अर्थ: दिव् (चमकना), नृत्य् (नाचना), भ्रम् (घूमना), नश् (नष्ट होना)

5. स्वादिगण

✨धातुओं की संख्या: 35 धातुएँ

✨उदाहरण और अर्थ: सु (रस निकालना), आप् (प्राप्त करना), शक् (सकना), श्रु (सुनना)

6. तुदादिगण

✨धातुओं की संख्या: 157 धातुएँ

 ✨उदाहरण और अर्थ: तुद् (दुःख देना), लिख् (लिखना), स्पृश् (छूना), मुच् (छोड़ना)

7. रुधादिगण

✨धातुओं की संख्या: 25 धातुएँ

✨उदाहरण और अर्थ: रुध (रोकना), भुज (खाना/पालन करना), भञ्ज (तोड़ना)

8. तनादिगण

✨धातुओं की संख्या: 10 धातुएँ

 ✨ उदाहरण और अर्थ: तन् (फैलाना), कृ (करना)

 9. क्र्यादिगण

✨धातुओं की संख्या: 61 धातुएँ

 ✨उदाहरण और अर्थ: क्री (खरीदना), ज्ञा (जानना), ग्रह् (पकड़ना), बन्ध् (बाँधना)

10. चुरादिगण

✨धातुओं की संख्या: 411 धातुएँ

  ✨उदाहरण और अर्थ: चुर् (चुराना), चिन्त् (सोचना), कथ् (कहना), भक्ष् (खाना)

कुल धातुएँ: लगभग 1970


गणों को याद रखने का मूल श्लोक:


भ्वाद्यादादी जुहोत्यादिदिवादिः स्वादिरेव च।

तुदादिश्च रुधादिश्च तनादिक्र्यादिचुरादयः॥