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व्याकरण शास्त्र की प्रमुख संज्ञाएं पार्ट : 2



10. अव्यय संज्ञा

👉सूत्र: स्वरादिनिपातमव्ययम्

👉 परिभाषा: ऐसे शब्द जो तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और वचनों में हमेशा एक जैसे रहते हैं, जिनका रूप कभी नहीं बदलता (यानी जिनका 'व्यय' या बदलाव नहीं होता), उन्हें अव्यय कहते हैं। इसमें स्वरादि गण के शब्द, च/वा आदि निपात तथा क्त्वा, ल्यप् व तुमुन् प्रत्यय वाले शब्द आते हैं।

👉 उदाहरण: अद्य (आज), श्वः (कल), गत्वा (जाकर), पठितुम् (पढ़ने के लिए)।


11. विभाषा संज्ञा

👉 सूत्र: न वेति विभाषा

👉 परिभाषा: जब व्याकरण में किसी नियम को करने की छूट होती है— यानी वह काम 'नहीं' भी हो सकता है और विकल्प से 'हाँ' भी हो सकता है, तो उस 'निषेध' (मनाही) और 'विकल्प' की मिली-जुली स्थिति को विभाषा कहते हैं।

👉उदाहरण: वाक्य में विकल्प दिखाना, जैसे— "त्वं पठ वा न वा" (तुम पढ़ो या न पढ़ो)।


12. सम्प्रसारण संज्ञा

👉सूत्र: इग्यणः सम्प्रसारणम्

👉 परिभाषा: यह यण् संधि का ठीक उल्टा नियम है। जब किसी धातु या शब्द में यण् वर्णों (य्, व्, र्, ल्) को बदलकर उनकी जगह क्रमशः इक् वर्ण (इ, उ, ऋ, ऌ) बिठा दिए जाते हैं, तो इस बदलाव को सम्प्रसारण कहते हैं।

👉 उदाहरण:

 ✨वच् + क्त = उक्तः (यहाँ 'व्' का 'उ' हुआ)

   ✨ यज् + क्त = इष्टः (यहाँ 'य्' का 'इ' हुआ)

   ✨स्वप् + क्त = सुप्तः (यहाँ 'व्' का 'उ' हुआ)


13. टि संज्ञा

👉सूत्र: अचोऽन्त्यादि टि

👉 परिभाषा: किसी भी शब्द को जब हम खोलकर लिखते हैं, तो उसमें जो सबसे आखिरी वाला स्वर होता है, वह स्वर और उसके बाद आने वाले सारे व्यंजन मिलकर 'टि' कहलाते हैं। अगर आखिरी स्वर के बाद कोई व्यंजन न हो, तो सिर्फ वह आखिरी स्वर ही 'टि' होता है।

👉 उदाहरण:

✨मनस् (म + अ + न + अ + स्) :- अंतिम स्वर 'अ' है और आगे 'स्' है, इसलिए 'अस्' की टि संज्ञा होगी।

✨ हरि (ह + अ + र + इ) :- अंतिम स्वर 'इ' है और आगे कुछ नहीं है, इसलिए केवल 'इ' की टि संज्ञा होगी।


14. उपधा संज्ञा

👉 सूत्र: अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा

👉 परिभाषा: किसी भी शब्द के बिल्कुल आखिरी वर्ण (चाहे वह स्वर हो या व्यंजन) से ठीक पहले वाला वर्ण यानी Second Last Letter (सेकंड लास्ट अक्षर) उपधा कहलाता है।

👉 उदाहरण:

✨राम (र + आ + म + अ) :- आखिरी वर्ण 'अ' है, उससे ठीक पहले 'म' है, अतः 'म' की उपधा संज्ञा है।

✨महत् (म + अ + ह + अ + त) :- आखिरी वर्ण 'त' है, उससे ठीक पहले 'अ' है, अतः 'अ' की उपधा संज्ञा है।


15. नदी संज्ञा

👉सूत्र: यू स्त्र्याख्यौ नदी

👉 परिभाषा: जो शब्द हमेशा स्त्रीलिंग में रहते हैं और उनके अंत में बड़ी 'ई' (दीर्घ ईकारान्त) या बड़ा 'ऊ' (दीर्घ ऊकारान्त) आता है, उन शब्दों की नदी संज्ञा होती है।

👉 उदाहरण: नदी, गौरी, वधू, लक्ष्मी, पृथ्वी।


16. घि संज्ञा

👉 सूत्र: शेषो घ्यसखि

👉सरल परिभाषा: नदी संज्ञा वाले शब्दों को छोड़कर, बाकी जितने भी छोटी 'इ' (ह्रस्व इकारान्त) और छोटे 'उ' (ह्रस्व ऊकारान्त) पर खत्म होने वाले शब्द हैं, उन सबकी 'घि' संज्ञा होती है। (अपवाद: 'सखि' शब्द की घि संज्ञा नहीं होती)।

👉उदाहरण: हरि, भानु, कवि, मति, वारि।


17. पद संज्ञा

👉सूत्र: सुप्तिङन्तं पदम्

👉परिभाषा: संस्कृत में मूल शब्द (प्रातिपदिक) या मूल धातु का सीधा वाक्य में प्रयोग नहीं कर सकते। जब शब्द के पीछे 'सुप्' प्रत्यय (शब्द रूप बनाने के लिए) या धातु के पीछे 'तिङ्' प्रत्यय (धातु रूप बनाने के लिए) लग जाते हैं, तभी वह शब्द वाक्य में प्रयोग होने लायक बनता है और उसे 'पद' कहते हैं।

👉उदाहरण: रामः, पठति, लतायाः, गच्छन्ति।


18. संहिता संज्ञा

👉सूत्र: परः संनिकर्षः संहिता

👉 परिभाषा: जब दो वर्ण बोलते या लिखते समय एक-दूसरे के इतने पास आ जाएँ कि उनके बीच में कोई दूसरा वर्ण या रुकावट न रहे, तो वर्णों की उस अत्यधिक निकटता को संहिता कहते हैं। इसी संहिता के होने पर संधि का नियम काम करता है।

👉उदाहरण:

✨उप + इन्द्रः 'प' का 'अ' और 'इ' की अत्यधिक निकटता संहिता है, जिससे उपेन्द्रः बनता है।

✨रमा + ईशः  'मा' का 'आ' और 'ई' की निकटता से रमेशः बनता है।


19. सत् संज्ञा

👉 सूत्र: तौ सत्

👉परिभाषा: वर्तमान काल का अर्थ बताने वाले दो विशेष प्रत्ययों— शतृ और शानच् को व्याकरण में एक साथ 'सत्' नाम दिया गया है।

👉उदाहरण: पठन् (पढ़ता हुआ), मोदमानः (प्रसन्न होता हुआ)।


20. प्रातिपदिक संज्ञा

👉सूत्र: अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् (तथा कृत्तद्धितसमासाश्च)

👉परिभाषा: धातु और प्रत्यय को छोड़कर, दुनिया का कोई भी ऐसा मूल शब्द जिसका कोई न कोई अर्थ निकलता हो, वह प्रातिपदिक कहलाता है। इसके अलावा प्रत्यय लगने के बाद बने कृदन्त, तद्धितान्त और समास वाले शब्दों की भी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। सीधे शब्दों में कहें तो विभक्तियां लगने से पहले का मूल शब्द ही प्रातिपदिक है।

👉उदाहरण: राम, कृष्ण, वृक्ष, दशरथपुत्र।


 21. प्रत्ययसंज्ञा

👉 परिभाषा: जो शब्दांश किसी धातु या प्रातिपदिक के बिल्कुल अंत में जुड़कर उसके अर्थ को बदल देते हैं या नया अर्थ देते हैं, उन्हें प्रत्यय कहते हैं।

👉प्रत्यय के मुख्य प्रकार:

1. कृत् प्रत्यय: जो केवल धातुओं (क्रियाओं) के अंत में लगते हैं। इनसे बने शब्दों को 'कृदन्त' कहते हैं। (जैसे: क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, शतृ, शानच् आदि)।

   2. तद्धित प्रत्यय: जो संज्ञा, सर्वनाम या विशेषण शब्दों के अंत में लगते हैं। इनसे बने शब्दों को 'तद्धितान्त' कहते हैं। (जैसे: मतुप्, इन्, त्व, तल् आदि)।

   3. स्त्री प्रत्यय: पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग शब्दों में बदलने के लिए जो प्रत्यय पीछे जोड़े जाते हैं, उन्हें स्त्री प्रत्यय कहते हैं। (जैसे: टाप्, ङीप्, ङीष् आदि)।

   👉 उदाहरण: अज (बकरा) + टाप् = अजा (बकरी), नर्तक + ङीष् = नर्तकी।

   4. सुप प्रत्यय (संख्या: 21): ये मूल शब्दों के पीछे लगकर प्रथमा से सप्तमी तक के शब्द रूप (विभक्तियां) बनाते हैं। (जैसे: सु, औ, जस्...)।

   5. तिङ् प्रत्यय (संख्या: 18): ये धातुओं के पीछे लगकर क्रियापद (काल और पुरुष के अनुसार रूप) बनाते हैं। (जैसे: तिप्, तस्, झि...)।


22. स्थानी और आदेश

👉स्थानी (जिसको हटाया जाए): संधि या कोई नियम करते समय जिस वर्ण को उसकी जगह से हटाया जाता है, उसे स्थानी कहते हैं।

👉आदेश (जो नया आकर बैठे): पुराने वर्ण को हटाकर जो नया वर्ण उसकी जगह पर आकर बैठ जाता है, उसे आदेश कहते हैं।

👉विशेष नियम: आदेश को "शत्रुवद्" (शत्रु की तरह) माना जाता है, क्योंकि यह पुराने वर्ण को पूरी तरह नष्ट करके उसका स्थान छीन लेता है।

👉उदाहरण: यदि + अपि = यद्यपि (यहाँ 'इ' को हटाकर 'य' आया, इसलिए 'इ' स्थानी है और 'य' आदेश है)।


23. निमित्त

रिभाषा: जिसके कारण या जिसकी वजह से कोई संधि या व्याकरण का कार्य होता है, उस कारण/वजह को 'निमित्त' कहते हैं।


24. आगम

👉 परिभाषा: जब कोई नया वर्ण पुराने किसी भी वर्ण को बिना हटाए या बिना नुकसान पहुँचाए, चुपचाप उनके बीच में आकर बैठ जाता है, तो उसे आगम कहते हैं।

👉विशेष नियम: आगम को "मित्रवद्" (मित्र की तरह) माना जाता है, क्योंकि यह किसी को हटाता नहीं बल्कि साथ में जुड़ जाता है।

👉उदाहरण: सम् + कृ + क्त = संस्कृत (यहाँ 'स' अक्षर का बीच में 'सुट्' आगम हुआ है, जिसने किसी को हटाया नहीं)।


25. उपसर्ग 

👉सूत्र: उपसर्गाः क्रियायोगे

👉सरल परिभाषा: जो शब्दांश किसी क्रिया या धातु के आगे (पहले) जुड़कर उसके अर्थ को बदल देते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं। संस्कृत में उपसर्ग तभी कहलाते हैं जब वे किसी क्रिया (verb) के साथ जुड़े हों।

👉कुल संख्या: संस्कृत में कुल 22 उपसर्ग होते हैं।

✨✨✨22 उपसर्गों की सूची:

✨प्र, परा, अप, सम्, अनु, अव, निस्, निर्, दुस्, दुर्, वि, आङ् (आ), नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि, उप।



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