संस्कृत क्लास : 01
एकदम धरातल से.......
👉संस्कृत .... सम् (उपसर्ग) + कृ (धातु) + क्त (प्रत्यय)
✨✨व्याकरण के नियम से बीच में आधा 'स्' अपने आप आ जाता है, जिसे सुट् का आगम कहते हैं।✨✨
🟥उपसर्ग जो शब्द के पहले जुड़ता है और शब्द का अर्थ बदल देता है ।
🟩संस्कृत में क्रिया (Action/Work) के मूल रूप को धातु कहते हैं। जैसे हिंदी में 'पढ़ना' क्रिया है, तो उसका मूल 'पढ़' है। उसी तरह संस्कृत में इसे धातु कहा जाता है। संस्कृत में पढ़ना का धातु पठ होता है ।
🟪प्रत्यय वो शब्दांश है जो किसी शब्द या धातु के पीछे जुड़कर उनका अर्थ में परिवर्तन लाते है ।
संस्कृत व्याकरण में तीन मुनि प्रख्यात है , जिन्हें त्रिमुनि भी कहा जाता है...
👉पाणिनी
👉कात्यायन / वररुचि
👉पतंजलि
महर्षि पाणिनी द्वारा रचित अष्टाध्यायी व्याकरण का एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है..!!
👉नाम से ही स्पष्ट हो रहा होगा अष्टाध्यायी में आठ अध्याय है , हर अध्याय में 4-4 पाद है तो कुल संख्या 32 हुई पाद की , और 3978 सूत्र है इसलिए महर्षि पाणिनी को सूत्रकार भी कहा जाता है..!!
🟥 Short में समझिए एक-चौथाई भाग को 'पाद' कहा जाता है...
एक्ट्रा ज्ञान 😅 :- संस्कृत में पैर को पाद कहा जाता है..!!
Our other study related group :- @JobAlerT678 & @JobAlerTstudY
संस्कृत क्लास : 02
👉हमने कल अष्टाध्यायी के बारे में पढ़ा था न पाणिनी जी की रचित , तो उसी अष्टाध्यायी के सूत्रों पर महर्षि कात्यायन जी ने वार्तिक लिखा था इसलिए उन्हें वर्तिककार कहते है ।
👉महर्षि पतंजलि ने अष्टाध्यायी के सूत्रों पर एक विस्तृत भाष्य लिखा , जिसे महाभाष्य कहते है , इसलिए महर्षि पतंजलि को भाष्यकार कहा जाता है ।
👉DSSSB TGT में जो प्रश्न आया था उसमें आपने एक नाम सुना आचार्य भट्टोजिदीक्षित जी का इन्होंने अष्टाध्यायी के सूत्रों पर वृत्ति लिखी थी इसलिए इनको वृत्तिकार कहा जाता है।उनकी सबसे प्रसिद्ध और कालजयी कृति 'सिद्धान्तकौमुदी' है।
🟥Fact:- महर्षि पतंजलि द्वारा रचित महाभाष्य में 84 /85 आह्निक है..!!
कुछ विद्वान 84 मानते है कुछ 85 तो थोड़ा सा मतभेद है 😅 बाकी कभी आया तो दोनों नहीं रहेगा एक साथ ऑप्शन में 👍
🟩आह्निक का सरल अर्थ है— "एक दिन का पाठ"
वर्ण विचार..!!
👉सबसे पहले आपके दिमाग में सवाल आना चाहिए वर्ण क्या है ?
✨सबसे पहले तो सामान्य भाषा में अभी जान लीजिए वर्ण और अक्षर एक ही चीज होते है , हम लोग अपने मुंह से जिन ध्वनियों को बोलते है वही वर्ण है , जैसे अ,आ , ई इत्यादि....
🟧एक श्लोक है संस्कृत में___
न क्षरति इति अक्षर:
इसका मतलब हुआ कि जिसका कभी विनाश न हो उसे अक्षर कहते है..!!
वर्ण दो प्रकार के होते है......
१) स्वर ( अच् )
२) व्यंजन ( हल् )
कोष्ठक के अंदर जो लिखा है उसे याद रखिएगा महेश्वर सूत्र में आपको ये दोनों शब्द याद दिलाएंगे दुबारा , बाकी का कल किया जाएगा धीरे धीरे सीखा जाए नहीं तो कल्याण हो जाएगा , दिमाग से बाहर चला जाएगा सब 😅😁
संस्कृत क्लास : 03
माहेश्वर सूत्र
👉 कुल 14 माहेश्वर सूत्र
🟥प्रत्येक सूत्र का जो अंतिम वर्ण है, उस पर हलन्त (्) लगा है (जैसे- ण, क, ङ, च आदि)। इन्हें 'इत्' वर्ण कहते हैं।
👉इनका उपयोग केवल शॉर्टफॉर्म (प्रत्याहार) बनाने के लिए होता है, वर्णों की गिनती करते समय इन्हें छोड़ दिया जाता है।
Image credit : google (my coaching website)
माहेश्वर सूत्र के बारे में :-
माहेश्वर सूत्र की उत्पत्ति और अन्य नामउत्पत्ति:
👉महर्षि पाणिनि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान महेश्वर (शिव) ने नृत्य के अवसान (समाप्ति) पर 14 बार डमरू बजाया, जिससे ये 14 सूत्र प्रकट हुए।
🟥प्रसिद्ध श्लोक:
"नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्..."
✨ अर्थात नटराज शिव ने सनकादि सिद्धों के उद्धार की कामना से 14 (नव + पञ्च) बार डमरू बजाया ✨
🟩अन्य नाम: इन सूत्रों को चतुर्दशसूत्र, प्रत्याहारसूत्र, शिवसूत्र और वर्णसमाम्नायसूत्र भी कहा जाता है।
माहेश्वर सूत्रों के विषय में ज्ञातव्य तथ्य (महत्वपूर्ण नियम)वर्णों का वैज्ञानिक क्रम:
👉सूत्रों में सबसे पहले स्वर हैं, उसके बाद अन्तःस्थ वर्ण (य व र ल) हैं। इसके बाद व्यंजनों के पंचम वर्ण (7वां सूत्र), चतुर्थ वर्ण (8वां और 9वां सूत्र), तृतीय वर्ण (10वां सूत्र), द्वितीय वर्ण और प्रथम वर्ण आते हैं। सबसे अंत में ऊष्म वर्ण (श ष स ह) दिए गए हैं।
👉इत्-संज्ञा और लोप: इन 14 सूत्रों के अंत में आने वाले हलन्त वर्ण (जैसे—ण, क, ङ, च आदि) 'इत्' संज्ञक कहलाते हैं। सूत्रों के अनुसार इन इत् संज्ञक वर्णों का लोप हो जाता है, अर्थात प्रत्याहार बनाते समय इनके बीच के वर्ण तो गिने जाते हैं, लेकिन इन्हें छोड़ दिया जाता है।
👉कुल इत्-संज्ञक वर्ण: कुल इत्-संज्ञक वर्णों की संख्या 14 होती है। (कुछ विशेष परिस्थितियों में 'लण्' सूत्र के अकार की इत्-संज्ञा मानकर इसे 15 भी कहा जाता है)। 'अनुबन्ध' और 'इत्' दोनों एक ही के पर्यायवाची हैं।
👉'अच्' (स्वर) की संख्या: पहले चार सूत्रों (अइउण् से लेकर ऐऔच् तक) से 'अच्' प्रत्याहार बनता है। इसमें आने वाले इत् वर्णों (ण, क, ङ, च) को छोड़कर कुल 9 स्वर (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ) आते हैं।
👉'ह' वर्ण की आवृत्ति: 5वें सूत्र 'हयवरट्' में भी 'ह' आता है और 14वें सूत्र 'हल्' में भी 'ह' आता है। अतः माहेश्वर सूत्रों में 'ह' वर्ण की गिनती दो बार की गई है।
संस्कृत क्लास : 04
👉'ह' वर्ण का दो बार ग्रहण क्यों? :-
✨'अट्' और 'शल्' प्रत्याहारों में 'ह' वर्ण को शामिल करने तथा 'अहेण' और 'अधुक्षत्' जैसे विशिष्ट प्रयोगों की सिद्धि के लिए माहेश्वर सूत्रों में 'ह' दो बार आया है।
👉माहेश्वर सूत्रों में 'ण' इत्संज्ञक वर्ण दो बार आया है- एक बार अइउण् में दूसरी बार लण् में।
इत्संज्ञा और लोप करने वाले प्रमुख सूत्र
👉हलन्त्यम् (1.3.3): उपदेश की अवस्था में जो अन्तिम हल् (व्यंजन) होता है, उसकी इत्संज्ञा होती है।
👉तस्य लोपः जिस वर्ण की इत्संज्ञा होती है, उसका लोप हो जाता है। उदाहरण के लिए, 'अइउण्' में 'ण्' की और 'ऋऌक्' में 'क्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर 'तस्य लोपः' से लोप हो जाता है।
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उपदेश क्या है?: "उपदेश आद्योच्चारणम्" अर्थात् पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि (मुनित्रय) ने व्याकरणशास्त्र में जिसका प्रथम उच्चारण या प्रथम पाठ किया, उसे उपदेश कहा जाता है।
प्रत्याहार संज्ञा विधायक सूत्र
👉आदिरन्त्येन सहेता (1.1.71): अन्त्य इत् वर्ण के साथ जो आदि वर्ण है, वह मध्यगामी सभी वर्णों का बोध कराता हुआ स्वयं का भी बोध कराता है।उदाहरण: 'अण्' प्रत्याहार 'अइउण्' सूत्र के 'अ' से लेकर इत्संज्ञक वर्ण 'ण्' से मिलकर बनता है, जिसमें अ, इ, उ ये तीन वर्ण आते हैं।
प्रत्याहारों की संख्या और वर्गीकरणकुल संख्या:
👉संस्कृत व्याकरण में कुल 42 प्रत्याहार होते हैं। (कुछ विद्वान 'रँ' और 'यम्' को मानकर इनकी संख्या 43 या 44 भी बताते हैं)।
🟥अच् प्रत्याहार (स्वर): इसमें समस्त 9 स्वर वर्ण आते हैं, इसलिए स्वरों को "अच्" भी कहा जाता है।
🟩हल् प्रत्याहार (व्यंजन): इसमें समस्त 33 व्यंजन वर्ण आते हैं, इसलिए व्यंजनों को "हल्" भी कहा जाता है।
🟧शल् प्रत्याहार: इसमें चारों ऊष्म वर्ण (श, ष, स, ह) आते हैं।
🟪यण् प्रत्याहार: इसमें चारों अन्तःस्थ वर्ण (य, व, र, ल) आते हैं।
संस्कृत क्लास : 05
वर्ण विचार
भाषा की वह सबसे छोटी इकाई (Unit) जिसके और टुकड़े या खंड नहीं किए जा सकते, उसे वर्ण या अक्षर कहते हैं।
जैसे: अ, इ, क्, ख्, प् आदि।
2. वर्णों के भेद
संस्कृत व्याकरण में वर्ण मुख्य रूप से दो प्रकार के होते हैं:
1. स्वर (अच्)
2. व्यंजन (हल्)
🟥 स्वर (अच्)
जिन वर्णों का उच्चारण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना स्वतंत्र रूप से होता है, उन्हें स्वर कहते हैं। माहेश्वर सूत्रों के अनुसार संस्कृत में स्वरों की कुल संख्या 9 मानी गई है।
स्वरों को तीन भागों में बांटा गया है:
👉 ह्रस्व स्वर (मूल स्वर): जिन स्वरों के उच्चारण में एक मात्रा का समय (सबसे कम समय) लगता है। ये 5 हैं: अ, इ, उ, ऋ, ऌ
👉 दीर्घ स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में दो मात्रा का समय (ह्रस्व से दोगुना) लगता है। ये 4 हैं (इन्हें संयुक्त स्वर भी कहते हैं क्योंकि ये दो अलग स्वरों से मिलकर बनते हैं):
ए, ऐ, ओ, औ
✨✨नोट: सामान्य संस्कृत में आ, ई, ऊ, ॠ को मिलाकर कुल 13 स्वर भी माने जाते हैं, लेकिन व्याकरण के मूल सूत्रों में मुख्य 9 स्वर ही हैं)।✨✨
👉 प्लुत स्वर: जिन स्वरों के उच्चारण में तीन मात्रा का समय लगे (जैसे किसी को दूर से पुकारने में)। इसके आगे ३ का अंक लिखा जाता है, जैसे: ओ३म्।
🟩 व्यंजन (हल्)
जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से नहीं हो सकता और जिन्हें बोलने के लिए स्वरों की सहायता लेनी पड़ती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं। संस्कृत में मूल व्यंजनों की कुल संख्या 33 है।
व्यंजनों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा गया है:
क) स्पर्श व्यंजन (वर्गीय व्यंजन)
इन्हें मुख के अलग-अलग अंगों को छूकर बोला जाता है। ये कुल 25 होते हैं और इन्हें 5 वर्गों में बांटा गया है (इसीलिए इन्हें वर्गीय व्यंजन कहते हैं):
क (क-वर्ग): क, ख, ग, घ, ङ
च (च-वर्ग): च, छ, ज, झ, ञ
ट (ट-वर्ग): ट, ठ, ड, ढ, ण
त (त-वर्ग): त, थ, द, ध, न
प (प-वर्ग): प, फ, ब, भ, म
ख) अन्तःस्थ व्यंजन
इनका उच्चारण स्वर और व्यंजन के बीच का सा होता है। यण् प्रत्याहार वाले ये 4 वर्ण हैं:
य, व, र, ल
ग) ऊष्म व्यंजन
इन वर्णों को बोलते समय मुख से गर्म हवा निकलती है। शल् प्रत्याहार वाले ये 4 वर्ण हैं:
श, ष, स, ह
🟪 अयोगवाह
ये वे वर्ण हैं जो न तो पूरी तरह स्वर हैं और न ही व्यंजन, लेकिन भाषा में उपयोग होते हैं। ये 4 प्रकार के होते हैं:
👉अनुस्वार: वर्ण के ऊपर लगने वाली बिंदु (जैसे: मं)
👉विसर्ग: वर्ण के पीछे लगने वाली दो बिंदियां (जैसे: रामः)
👉जिह्वमूलीय: ᳲक और ᳲख से पहले आने वाला आधा विसर्ग जैसा चिह्न
👉 उपध्मानीय: प और फ से पहले आने वाला आधा विसर्ग जैसा चिह्न (प, फ)
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Radhe Radhe 😊❤️
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संस्कृत क्लास : 06
'उच्चारण स्थान'
मुख का वह भाग जहाँ से किसी विशेष वर्ण को बोलते समय जिह्वा (जीभ) या वायु स्पर्श करती है। पाणिनीय शिक्षा के अनुसार मुख्य रूप से 8 उच्चारण स्थान माने गए हैं, लेकिन सूत्रों के माध्यम से इन्हें 11 प्रमुख श्रेणियों में समझा जाता है।
1. कण्ठ (Throat)
✨सूत्र: "अकुहविसर्जनीयानां कण्ठः"
✨व्याख्या: इस स्थान से बोले जाने वाले वर्णों को कण्ठ्य वर्ण कहते हैं।
✨शामिल वर्ण:
👉अ, आ (दोनों स्वर)
👉क = पूरा क-वर्ग (क, ख, ग, घ, ङ)
👉ह (ऊष्म व्यंजन)
👉विसर्ग ( ः )
2. तालु (मुख की छत का पिछला भाग)
✨सूत्र: "इचुयशानां तालु"
✨व्याख्या: इनसे निकलने वाली ध्वनियों को तालव्य वर्ण कहा जाता है।
शामिल वर्ण:
👉इ, ई
👉च = पूरा च-वर्ग (च, छ, ज, झ, ञ)
👉य (अन्तःस्थ व्यंजन)
👉श (तालव्य शकार)
3. मूर्धा (मुख की छत का अगला/कठोर भाग)
✨सूत्र: "ऋटुरषाणां मूर्धा"
✨व्याख्या: इन्हें मूर्धन्य वर्ण कहा जाता है। इन्हें बोलते समय जीभ ऊपर की ओर मुड़ती है।
शामिल वर्ण:
👉ऋ, ॠ
👉टु = पूरा ट-वर्ग (ट, ठ, ड, ढ, ण)
👉र (अन्तःस्थ व्यंजन)
👉ष (मूर्धन्य षकार)
4. दन्त (Teeth)
✨सूत्र: "लृटुलसानां दन्ताः"
✨व्याख्या: इन्हें दन्त्य वर्ण कहते हैं। इन्हें बोलते समय जीभ दांतों को छूती है।
✨शामिल वर्ण:
👉ऌ (स्वर)
👉त = पूरा त-वर्ग (त, थ, द, ध, न)
👉ल (अन्तःस्थ व्यंजन)
👉स (दन्त्य सकार)
5. ओष्ठ (Lips)
✨सूत्र: "उपूपध्मानीयानाम् ओष्ठौ"
✨व्याख्या: इन्हें ओष्ठ्य वर्ण कहा जाता है। इन्हें बोलते समय दोनों होठों का मेल होता है।
✨शामिल वर्ण:
👉उ, ऊ
👉प = पूरा प-वर्ग (प, फ, ब, भ, m)
👉उपध्मानीय (प और फ से पहले आने वाला आधा विसर्ग)
6. नासिका (Nose)
✨सूत्र: "ञमङणनानां नासिका च"
✨व्याख्या: प्रत्येक वर्ग का पंचम वर्ण अपने मूल उच्चारण स्थान के साथ-साथ नासिका से भी बोला जाता है। इसीलिए सूत्र में 'च' (और) लगा है।
✨शामिल वर्ण:
👉ञ, म, ङ, ण, न (इनका दोहरा उच्चारण स्थान होता है, जैसे 'ङ' का कण्ठ + नासिका)।
संयुक्त उच्चारण स्थान (Double Articulation)
🟥कुछ वर्ण दो अंगों की सहायता से बोले जाते हैं:
7. कण्ठ-तालु
✨सूत्र: "एदैतोः कण्ठतालु"
✨व्याख्या: ये वर्ण कण्ठ और तालु दोनों से मिलकर उच्चारित होते हैं।
✨शामिल वर्ण:
👉 ए, ऐ (चूँकि 'ए' अ + इ से मिलकर बनता है, इसलिए अ का कण्ठ और इ का तालु मिलकर कण्ठतालु बनते हैं)।
8. कण्ठ-ओष्ठ
✨सूत्र: "ओदौतोः कण्ठोष्ठम्"
✨व्याख्या: ये वर्ण कण्ठ और होठों की सहायता से बोले जाते हैं।
✨शामिल वर्ण:
👉ओ, औ (चूँकि 'ओ' अ + उ से बनता है, इसलिए कण्ठ + ओष्ठ)।
9. दन्त-ओष्ठ
✨सूत्र: "वकारस्य दन्तोष्ठम्"
✨व्याख्या: यह परीक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें केवल एक ही वर्ण आता है।
✨शामिल वर्ण:
👉व (दांत और होठों के मेल से बोला जाता है)।
कुछ अतिरिक्त उच्चारण स्थान
10. जिह्वामूल
✨सूत्र: "जिह्वामूलीयस्य जिह्वामूलम्"
✨शामिल वर्ण:
👉ᳲक और ᳲख (क और ख से पहले आने वाला आधा विसर्ग)।
11. केवल नासिका
✨सूत्र: "नासिका अनुस्वारस्य"
✨शामिल वर्ण:
👉अनुस्वार ( ं ) का उच्चारण केवल नासिका से होता है।
संस्कृत क्लास : 07
उच्चारण स्थान का एक अन्य नियम
🟧 'उरः' (हृदय) का विशेष नियम
👉जब 'ह' वर्ण या पंचम वर्ण (ङ, ञ, ण, न) किसी अन्य व्यंजन के साथ संयुक्त होकर आते हैं, तब उनका उच्चारण स्थान कण्ठ न होकर 'उरः' (हृदय/छाती) माना जाता है।उदाहरण: 'अपराह्न' शब्द में 'ह' का उच्चारण स्थान उरः होगा, केवल कण्ठ नहीं।
"वर्णों का आभ्यन्तर एवं बाह्य प्रयत्न"
प्रयत्न की परिभाषा और भेद
परिभाषा: वर्णों के उच्चारण करने के लिए मुख के भीतर जो चेष्टा (प्रयास) की जाती है, उसे प्रयत्न कहते हैं।
✨ भेद: प्रयत्न दो प्रकार के होते हैं:
I. आभ्यन्तर प्रयत्न: वर्णों के उच्चारण से पूर्व मुख के भीतर होने वाला प्रयास।
II. बाह्य प्रयत्न: मुख से वर्ण बाहर निकलते समय होने वाला प्रयास।
1. आभ्यन्तर प्रयत्न
आभ्यन्तर प्रयत्न पाँच प्रकार के होते हैं:
I. स्पृष्ट :
👉अर्थ: स्पर्श किया हुआ।
👉इसमें जिह्वा (जीभ) विभिन्न उच्चारण स्थानों (कण्ठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) को स्पर्श करती है।
👉वर्ण: क से म तक के सभी 25 वर्ण। इन्हें 'स्पर्श वर्ण' भी कहते हैं।
👉सूत्र: "स्पृष्टं प्रयत्नं स्पर्शानाम्"
II. ईषत्स्पृष्ट :
👉अर्थ: थोड़ा छुआ हुआ।
👉इसमें जिह्वा उच्चारण स्थानों को बहुत थोड़ा स्पर्श करती है।
👉वर्ण: य, र, ल, व (अन्तस्थ वर्ण)।
👉सूत्र: "ईषत्स्पृष्टमन्तस्थानाम्"
III. ईषद्विवृत :
👉अर्थ: थोड़ा खुला हुआ।
👉इसमें वायु का मार्ग थोड़ा खुला रहता है और मुख से हल्की ऊष्मा निकलती है।
👉वर्ण: श, ष, स, ह (ऊष्म वर्ण)।
👉सूत्र: "ईषद्विवृतमूष्मणाम्"
IV. विवृत :
👉अर्थ: खुला हुआ।
👉इसमें वर्णों का उच्चारण करते समय मुख पूरा खुला रहता है।
👉वर्ण: सभी स्वर (अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, औ)।
👉सूत्र: "विवृतं स्वराणाम्"
V. संवृत :
👉अर्थ: ढका हुआ या बंद।
👉इसमें वायु का मार्ग बंद रहता है।
👉विशेष नियम: केवल ह्रस्व 'अ' (छोटे अ) का प्रयोग काल (बोलने की सामान्य अवस्था) में संवृत प्रयत्न होता है। लेकिन व्याकरण प्रक्रिया (सिद्धि या संधि कार्य) की दशा में यह विवृत ही रहता है।
👉सूत्र: "ह्रस्वस्यावर्णस्य प्रयोगे संवृतम्, प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव"
2. बाह्य प्रयत्न
मुख से वर्ण बाहर निकलते समय जो यत्न होता है, उसे बाह्य प्रयत्न कहते हैं। ये संख्या में 11 प्रकार के होते हैं:
1. विवार | 2. संवार | 3. श्वास | 4. नाद | 5. घोष | 6. अघोष | 7. अल्पप्राण | 8. महाप्राण | 9. उदात्त | 10. अनुदात्त | 11. स्वरित
संस्कृत क्लास : 08
पिछली क्लास के कुछ बचे हुए टॉपिक
✨✨महत्वपूर्ण वर्गीकरण (प्रत्याहार के आधार पर):✨✨
खर् प्रत्याहार (विवार, श्वास, अघोष):
👉इसके अंतर्गत प्रत्येक वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण और श, ष, स आते हैं।
👉वर्ण: ख, फ, छ, ठ, थ, च, ट, त, क, प, श, ष, स।
👉सूत्र: "खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्च"
हश् प्रत्याहार (संवार, नाद, घोष):
👉 इसके अंतर्गत प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण और ह, य, र, ल, व आते हैं।
👉वर्ण: ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म, ह, य, र, ल, व।
👉सूत्र: "हशः संवारा नादा घोषाश्च"
4. अल्पप्राण
👉अर्थ: 'प्राण' का अर्थ वायु है। जिस वर्ण को बोलने में मुख से कम वायु बाहर फेंकनी पड़े, उसे अल्पप्राण कहते हैं।
👉अल्पप्राण वर्ण:
✨प्रत्येक वर्ग का प्रथम, तृतीय और पञ्चम वर्ण (1, 3, 5)
✨यण् वर्ण (य, र, ल, व)
👉सूत्र: "वर्गाणां प्रथम-तृतीय-पञ्चमाः यणश्चाल्पप्राणाः"
✨✨✨कुल संख्या: 19 व्यंजन वर्ण (5 वर्ग × 3 वर्ण = 15 + 4 अन्तस्थ वर्ण)।✨✨✨
व्याकरणशास्त्र की प्रमुख संज्ञाएँ एवं परिभाषाएँ
1. वृद्धि संज्ञा
👉सूत्र: वृद्धिरादैच्
👉पहचान: आ, ऐ, औ — इन तीन वर्णों को 'वृद्धि' संज्ञक वर्ण कहा जाता है।
✉️उदाहरण: एकैकम् (क में 'ऐ' की मात्रा है) जलौघः (ल में 'औ' की मात्रा है) तथैव (थ में 'ऐ' की मात्रा है)
✨नोट: ध्यान रखें, 'वृद्धिरेचि' संधि का सूत्र है, जबकि संज्ञा का सूत्र 'वृद्धिरादैच्' है।
2. गुण संज्ञा
👉सूत्र: अदेङ् गुणः
👉पहचान: अ, ए, ओ — इन तीन वर्णों की 'गुण' संज्ञा होती है।
✉️उदाहरण: उपेन्द्रः (प में 'ए' की मात्रा है) महोत्सवः (ह में 'ओ' की मात्रा है) देवर्षिः (व में 'अ' और र् की ध्वनि है)
3. संयोग संज्ञा
👉सूत्र: हलोऽनन्तराः संयोगः
👉परिभाषा: जब दो या दो से अधिक व्यंजनों (हल्) के बीच में कोई स्वर (अच्) न आए, तो उन व्यंजनों के आपस में मिलने को 'संयोग' कहते हैं।
✉️उदाहरण:
👉महत्त्व (त् + त् + व का संयोग)
👉इन्द्र (न् + द् + र का संयोग)
👉सूर्य (र् + य का संयोग)
4. अनुनासिक संज्ञा
👉सूत्र: मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः
👉परिभाषा: जो वर्ण मुख और नासिक (नाक) दोनों की सहायता से बोले जाते हैं, उनकी अनुनासिक संज्ञा होती है।
👉उदाहरण: हाँ , माँ (चन्द्रबिन्दु वाले शब्द) वाङ् मयम् (ङ और म अनुनासिक वर्ण हैं)
✉️विशेष: जो वर्ण केवल नासिका से नहीं बल्कि मुख और नासिका दोनों से बोले जाएँ, वही अनुनासिक हैं (जैसे वर्ग के ५वें अक्षर)।
5. सवर्ण संज्ञा
👉सूत्र: तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम्
👉परिभाषा: जिन दो या दो से अधिक वर्णों का उच्चारण स्थान और आभ्यन्तर प्रयत्न दोनों समान (एक जैसे) होते हैं, वे आपस में 'सवर्ण' कहलाते हैं।
✉️उदाहरण:
👉कवि + ईशः = कवीशः (इ और ई सवर्ण हैं) भानु + उदयः = भानूदयः (उ और ऊ सवर्ण हैं) पितृ + ऋणम् = पितृणम् (ऋ और ऋ सवर्ण हैं)
6. प्रगृह्य संज्ञा
👉सूत्र: ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्यम्
👉परिभाषा: द्विवचन के अन्त में आने वाले ई (दीर्घ ई), ऊ (दीर्घ ऊ), और ए की 'प्रगृह्य' संज्ञा होती है। (इनके बाद संधि कार्य नहीं होता)।
✉️उदाहरण:
👉कवी इमौ (कवी द्विवचन है, अंत में 'ई' है) साधू अत्र (साधू द्विवचन है, अंत में 'ऊ' है) लते एते (लते द्विवचन है, अंत में 'ए' है)
7. 'घ' संज्ञा
👉सूत्र: तरप्तमपौ घः
👉परिभाषा: 'तरप' (comparative degree - जैसे उच्चतर) और 'तमप' (superlative degree - जैसे उच्चतम) इन दो प्रत्ययों की 'घ' संज्ञा होती है।
✉️उदाहरण: लघुतरः (तरप प्रत्यय) / लघुतमः (तमप प्रत्यय)
उच्चतरः (तरप प्रत्यय) / उच्चतमः (तमप प्रत्यय)
8. निष्ठा संज्ञा
👉सूत्र: क्तक्तवतू निष्ठा
👉परिभाषा: 'क्त' और 'क्तवतु' इन दो भूतकालिक प्रत्ययों की 'निष्ठा' संज्ञा होती है।
✉️उदाहरण: गतः (क्त) / गतवान् (क्तवतु) , कृतः (क्त) / कृतवान् (क्तवतु) , लिखितः (क्त) / लिखितवान् (क्तवतु)
9. सर्वनाम संज्ञा
👉सूत्र: सर्वादीनि सर्वनामानि
👉परिभाषा: 'सर्व' आदि शब्दों (जैसे- सर्व, विश्व, उभ, यत्, तत् आदि) की 'सर्वनाम' संज्ञा होती है।
✉️उदाहरण : अयम्, इयम्, इदम् (यह)सः, सा, तत् (वह)अस्मद्, युष्मद् (मैं, तुम)
To be continued.....!!!!!!!
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