• नियम और पहचान: चाहिए अथवा योग्यता के अर्थ में इन प्रत्ययों का प्रयोग कर्मवाच्य और भाववाच्य में होता है। तव्यत् में 'तव्य' और अनीयर् में 'अनीय' शेष रहता है। इनके रूप तीनों लिंगों में चलते हैं।
• तव्यत् प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• पठ् + तव्यत् = पठितव्यः / पठितव्या / पठितव्यम् (पढ़ना चाहिए)
• कृ + तव्यत् = कर्तव्यः / कर्तव्या / कर्तव्यम् (करना चाहिए — UP-TET)
• दृश् + तव्यत् = द्रष्टव्यः / द्रष्टव्या / द्रष्टव्यम् (देखना चाहिए)
• गम् + तव्यत् = गन्तव्यः / गन्तव्या / गन्तव्यम् (जाना चाहिए)
• अनीयर् प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• पठ् + अनीयर् = पठनीयः / पठनीया / पठनीयम् (पढ़ने योग्य — Super TET)
• कृ + अनीयर् = करणीयः / करणीया / करणीयम् (करने योग्य)
• दृश् + अनीयर् = दर्शनीयः / दर्शनीया / दर्शनीयम् (देखने योग्य)
• गम् + अनीयर् = गमनीयः / गमनीया / गमनीयम् (जाने योग्य)
क्त (त) और क्तवतु (तवत्) प्रत्यय
• नियम और पहचान: सूत्र 'क्तक्तवतू निष्ठा' से इन्हें 'निष्ठा' संज्ञा दी गई है। इनका प्रयोग भूतकाल के अर्थ में होता है। क्त प्रत्यय में 'त' शेष रहता है (कर्मवाच्य/भाववाच्य) और क्तवतु में 'तवत्/वान्' शेष रहता है (कर्तृवाच्य)।
• क्त प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• गम् + क्त = गतः / गता / गतम् (गया)
• कृ + क्त = कृतः / कृता / कृतम् (किया — UP-TET)
• पठ् + क्त = पठितः / पठिता / पठितम् (पढ़ा)
• क्तवतु प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• गम् + क्तवतु = गतवान् / गतवती / गतवत् (गया — CTET)
• कृ + क्तवतु = कृतवान् / कृतवती / कृतवत् (किया)
• पठ् + क्तवतु = पठितवान् / पठितवती / पठितवत् (पढ़ा)
णमुल् प्रत्यय
• नियम और पहचान: जब कोई क्रिया बार-बार (पुनरावृत्ति) की जाती है, तब पूर्वकालिक क्रिया में णमुल् प्रत्यय लगता है। इसमें केवल 'अम्' शेष रहता है। इससे बने शब्द अव्यय होते हैं और धातु के स्वर में वृद्धि होती है।
• प्रमुख उदाहरण:
• ताड् + णमुल् = ताडं ताडम् (मार-मार कर)
• पा + णमुल् = पायं पायम् (पी-पी कर — REET)
• गम् + णमुल् = गामं gāmām (जा-जा कर)
• श्रु + णमुल् = श्रावं श्रावम् (सुन-सुन कर)
शतृ और शानच् प्रत्यय
• नियम और पहचान: ये दोनों वर्तमानकालिक (हुआ/हुई के अर्थ में) प्रत्यय हैं। परस्मैपदी धातुओं में शतृ (शेष: अत्/न्) और आत्मनेपदी धातुओं में शानच् (शेष: आन/मान) लगता है।
• शतृ प्रत्यय के उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• पठ् + शतृ = पठन् / पठन्ती / पठत् (पढ़ता हुआ — UP-TET)
• गम् + शतृ = गच्छन् / गच्छन्ती / गच्छत् (जाता हुआ)
• दृश् + शतृ = पश्यन् / पश्यन्ती / पश्यत् (देखता हुआ)
• शानच् प्रत्यय के उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• सेव् + शानच् = सेवमानः / सेवमाना / सेवमानम् (सेवा करता हुआ)
• लभ् + शानच् = लभमानः (प्राप्त करता हुआ)
• वृध् + शानच् = वर्धमानः / वर्धमाना / वर्धमानम् (बढ़ता हुआ — CTET)
तद्धित प्रत्यय (संज्ञा/विशेषण शब्दों से जुड़ने वाले)
(क) मतुप् प्रत्यय
• नियम और पहचान: 'वाला' या 'युक्त' के अर्थ में यह प्रत्यय जुड़ता है। इसमें 'मत्' या 'वत्' शेष रहता है। यदि शब्द के अंत में 'अ' या 'आ' हो, तो 'म' का 'व' हो जाता है।
• प्रमुख उदाहरण (पुं. / स्त्री. / नपुं.):
• श्री + मतुप् = श्रीमान् / श्रीमती / श्रीमत् (लक्ष्मीवान — UP-TET)
• बुद्धि + मतुप् = बुद्धिमान् / बुद्धिमती / बुद्धिमत् (बुद्धि वाला)
• बल + मतुप् = बलवान् / बलवती / बलवत् (बल वाला)
• धन + मतुप् = धनवान् / धनवती / धनवत् (धन वाला)
(ख) इनि (इन्) प्रत्यय
• नियम और पहचान: 'वाला' अर्थ में अकारान्त शब्दों से 'इनि' प्रत्यय होता है, जिसका केवल 'इन्' शेष रहता है। पुल्लिंग प्रथमा विभक्ति एकवचन में यह 'ई' दिखता है।
• प्रमुख उदाहरण:
• धन + इनि = धनी (धन वाला — Super TET)
• बल + इनि = बली (बलशाली)
• ज्ञान + इनि = ज्ञानी (ज्ञान वाला)
(ग) त्व और तल् प्रत्यय
• नियम और पहचान: शब्दों को भाववाचक संज्ञा में बदलने के लिए इनका प्रयोग होता है। त्व प्रत्यय से बने शब्द नपुंसकलिंग ('त्वम्') और तल् प्रत्यय से बने शब्द स्त्रीलिंग ('ता') होते हैं।
• प्रमुख उदाहरण (त्व प्रत्यय / तल् प्रत्यय):
• गुरु + प्रत्यय = गुरुत्वम् / गुरुता (भारीपन — UP-TET)
• लघु + प्रत्यय = लघुत्वम् / लघुता (छोटापन)
• मनुष्य + प्रत्यय = मनुष्यत्वम् / मनुष्यता (मनुष्यता)
(घ) ठक् (इक्) प्रत्यय
• नियम और पहचान: भाव या संबंध के अर्थ में 'ठक्' प्रत्यय लगता है। 'ठ्' को 'इक्' आदेश होता है और शब्द के प्रथम स्वर की वृद्धि हो जाती है।
• प्रमुख उदाहरण:
• धर्म + ठक् = धार्मिकः (धर्म से संबंधित — CTET/UP-TET)
• समाज + ठक् = सामाजिकः (सामाजिक)
• दिन + ठक् = दैनिकः (रोज का)
• लोक + ठक् = लौकिकः (संसार का)
स्त्री प्रत्यय (पुल्लिंग से स्त्रीलिंग बनाने वाले)
(क) टाप् प्रत्यय
• नियम और पहचान: अकारान्त पुल्लिंग शब्दों को स्त्रीलिंग बनाने के लिए 'टाप्' प्रत्यय जुड़ता है। इसमें केवल 'आ' शेष बचता है। यदि शब्द के अंत में 'क' हो, तो उससे पहले 'इ' जोड़ दिया जाता है।
• प्रमुख उदाहरण:
• अज + टाप् = अजा (बकरी — UP-TET)
• चटक + टाप् = चटका (चिड़िया)
• अश्व + टाप् = अश्वा (घोड़ी)
• बालक + टाप् = बालिका (इत्व नियम के तहत)
• लेखक + टाप् = लेखिका
(ख) ङीप्, ङीष् और ङीन् प्रत्यय
• नियम और पहचान: इन तीनों प्रत्ययों में केवल दीर्घ 'ई' शेष बचती है। ऋकारान्त/नकारान्त शब्दों में ङीप्, जातिवाचक शब्दों में ङीष्, और विशेष मानव बोधक शब्दों में ङीन् लगता है।
• प्रमुख उदाहरण:
• नद + ङीप् = नदी (UP-TET)
• कुमार + ङीप् = कुमारी
• नर्तक + ङीष् = नर्तकी (व्यवसाय/जाति बोधक)
• गौर + ङीष् = गौरी (गौरादिगण)
• नर / नृ + ङीन् = नारी (स्त्री — HTET/UP-TET)
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