व्यंजन संधि के अन्य भेद
अपदान्त जश्त्व सन्धि
सूत्र: झलां जश् झशि (८.४.५३)
परिभाषा: जब किसी शब्द के बीच में (अपदान्त) झल् वर्ण (वर्ग का 1, 2, 3, 4 अक्षर या श, ष, स, ह) आए और उसके ठीक बाद झश् वर्ण (वर्ग का 3 या 4 अक्षर) आए, तो पहले वाले वर्ण के स्थान पर उसी वर्ग का तीसरा अक्षर (ज्, ब्, ग्, ड्, द्) हो जाता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण :
1. बुध् + धः = बुद्धः
2. क्रुध् + धा = क्रुद्धा
3. युध् + धः = युद्धः
4. लभ् + धा = लब्धा
5. सिध् + धिः = सिद्धिः
6. दुह् + धम् = दुग्धम्
चर्त्व सन्धि
👉सूत्र: खरि च (८.४.५५)
👉परिभाषा: यदि पहले पद के अंत में झल् वर्ण (वर्ग का 1, 2, 3, 4 अक्षर या श, ष, स, ह) हो और उसके बाद खर् वर्ण (वर्ग का 1, 2 अक्षर या श, ष, स) आए, तो पहले वाले वर्ण को अपने ही वर्ग का पहला अक्षर (च्, ट्, त्, क्, प्) बना दिया जाता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण:
1. सद् + कारः = सत्कारः
2. उद् + पन्नः = उत्पन्नः
3. विपद् + कालः = विपत्कालः
4. दिग् + पालः = दिक्पालः
5. लभ् + स्यते = लप्स्यते
6. सद् + पात्रम् = सत्पात्रम्
अनुस्वार सन्धि
👉सूत्र: मोऽनुस्वारः (८.३.२३)
👉परिभाषा: यदि किसी पद (शब्द) के अंत में 'म्' (मकार) हो और उसके बाद कोई भी व्यंजन (हल्) वर्ण आए, तो 'म्' को हटाकर उसकी जगह अनुस्वार ( ं) लगा दिया जाता है।
👉विशेष नियम: अगर बाद में कोई स्वर (अ, आ, इ आदि) आए, तो 'म्' अनुस्वार नहीं बनता, बल्कि स्वर में मिल जाता है (जैसे: अहम् + अपि = अहमपि)।
महत्वपूर्ण उदाहरण :
1. हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
2. सत्यम् + वद = सत्यं वद
3. गृहम् + गच्छति = गृहं गच्छति
4. त्वम् + करोषि = त्वं करोषि
5. अहम् + गच्छामि = अहं गच्छामि
तोर्ली सन्धि (लत्व सन्धि)
👉सूत्र: तोर्ली (८.४.६०)
👉परिभाषा: यदि त-वर्ग (त्, थ्, द्, ध्, न्) के बाद 'ल' वर्ण आए, तो त-वर्ग के स्थान पर भी 'ल' हो जाता है।
👉विशेष नियम: यदि 'न्' के बाद 'ल' आता है, तो 'न्' अनुनासिक (चन्द्रबिन्दु) के साथ 'लँ' में बदलता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण :
1. तत् + लीनः = तल्लीनः
2. उत् + लेखः = उल्लेखः
3. उत् + लासः = उल्लासः
4. विद्वान् + लिखति = विद्वाँल्लिखति (न् का अनुनासिक रूप)
5. महान् + लाभः = महाँल्लाभः
परसवर्ण सन्धि
👉सूत्र: अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः (८.४.५८)
👉परिभाषा: यदि शब्द के बीच में अनुस्वार ( ं) हो और उसके बाद श, ष, स, ह को छोड़कर कोई भी व्यंजन (यय् वर्ण) आए, तो अनुस्वार के स्थान पर बाद वाले वर्ण के वर्ग का पाँचवाँ (अनुनासिक) अक्षर हो जाता है।
महत्वपूर्ण उदाहरण :
1. सम् + कल्पः = सङ्कल्पः
2. अम् + कितः = अङ्कितः
3. गम् + गा = गङ्गा
4. सम् + चयः = सञ्चयः
5. शम् + तः = शान्तः
6. कुम् + ठितः = कुण्ठितः
अनुनासिक सन्धि
👉सूत्र: यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा (८.४.४५) / वार्तिक: प्रत्यये भाषायां नित्यम्
👉परिभाषा: यदि पद के अंत में किसी वर्ग का 1, 2, 3, 4 अक्षर हो और उसके बाद कोई अनुनासिक वर्ण (न्, म्) आए, तो पहले वाले अक्षर के स्थान पर विकल्प से उसी वर्ग का पाँचवाँ अक्षर हो जाता है।
👉 विशेष नियम (वार्तिक): यदि बाद में आने वाला अनुनासिक वर्ण कोई प्रत्यय (जैसे- मयट्, मात्रच्) हो, तो यह बदलाव नित्य (अनिवार्य) होता है, वहाँ विकल्प नहीं चलता।
महत्वपूर्ण उदाहरण :
1. जगत् + नाथः = जगन्नाथः (नित्य सन्धि )
2. वाक् + मयम् = वाङ्मयम् (प्रत्यय होने के कारण नित्य)
3. एतद् + मुरारिः = एतन्मुरारिः / एतद्मुरारिः (विकल्प से दोनों सही)
4. षट् + मासाः = षण्मासाः
5. तत् + मात्रम् = तन्मात्रम्

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