कारक तथा विभक्ति
वाक्य में जिसका क्रिया के साथ सीधा या साक्षात् संबंध होता है, उसे कारक कहते हैं। संस्कृत व्याकरण में कारकों की कुल संख्या 6 मानी गई है। संबंध और संबोधन को कारक नहीं माना जाता है, क्योंकि इनका क्रिया से सीधा संबंध नहीं होता।
विभक्ति और कारक चिह्न
| विभक्ति | कारक | चिह्न |
| प्रथमा | कर्ता | ने |
| द्वितीया | कर्म | को |
| तृतीया | करण | से / द्वारा |
| चतुर्थी | सम्प्रदान | के लिए |
| पञ्चमी | अपादान | से (अलग होना) |
| षष्ठी | सम्बन्ध | का, के, की, रा, रे, री |
| सप्तमी | अधिकरण | में, पे, पर |
| प्रथमा | सम्बोधन | हे, भो, अरे |
1. प्रथमा विभक्ति (कर्ता कारक)
क. स्वतंत्रः कर्ता
वाक्य में क्रिया को करने में जिसकी स्वतंत्रता मानी जाती है, उसे कर्ता कहते हैं। कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है।
✨बालकः लिखति। (बालक लिखता है।)
✨ लता गच्छति। (लता जाती है।)
✨ मोहनः पठति। (मोहन पढ़ता है।)
ख. प्रातिपदिकार्थ-लिंग-परिमाण-वचनमात्रे प्रथमा
किसी शब्द का केवल अर्थ (प्रातिपदिकार्थ), लिंग, परिमाण (माप) या वचन (संख्या) प्रकट करने के लिए प्रथमा विभक्ति का प्रयोग होता है।
✨कृष्णः, मतिः, ज्ञानम् (नियत अर्थ बताने के लिए)
✨तटः, तटी, तटम् (लिंग निश्चित करने के लिए)
✨आढकम् (माप या परिमाण बताने के लिए)
✨ द्वौ, बहवः (संख्या या वचन बताने के लिए)
✨ उच्चैः, नीचैः, श्रीः (प्रातिपदिकार्थ)
✨द्रोणो व्रीहिः (परिमाण)
✨ एकः (संख्या)
ग. सम्बोधने च
👉किसी को बुलाने या संबोधित करने के अर्थ में प्रथमा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।
✨ हे कृष्ण! अत्र आगच्छ। (हे कृष्ण! यहाँ आओ।)
✨हे राम! अत्र आगच्छ। (हे राम! यहाँ आओ।)
घ. उक्ते कर्तरि प्रथमा
👉कर्तृवाच्य के वाक्यों में जो प्रधान कर्ता होता है, उसमें प्रथमा विभक्ति लगती है।
✨ गजाः चलन्ति। (हाथी चलते हैं।)
✨रामः गृहं गच्छति। (राम घर जाता है।)
2. द्वितीया विभक्ति (कर्म कारक)
क. कर्तुरीप्सिततमं कर्म (कर्मणि द्वितीया)
👉कर्ता अपनी क्रिया के माध्यम से जिस वस्तु या व्यक्ति को सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, उसे कर्म कहते हैं और कर्म में द्वितीया विभक्ति होती है।
✨ छात्रः पुस्तकं पठति। (छात्र पुस्तक पढ़ता है।)
✨ सः दुग्धं पिबति। (वह दूध पीता है।)
✨ रामः लेखन्या पत्रं लिखति। (राम कलम से पत्र लिखता है।)
ख. अकथितं च (16 द्विकर्मक धातुएँ)
👉जहाँ अपादान, संप्रदान आदि कारकों की विवक्षा नहीं होती, वहाँ इन 16 द्विकर्मक धातुओं के मुख्य और गौण दोनों कर्मों में द्वितीया विभक्ति लगती है।
(धातुएँ: दुह, याच्, पच्, दण्ड्, रुध्, प्रच्छ्, चि, ब्रू, शास्, जि, मथ्, मुष्, नी, हृ, कृश्, वह्)
✨ सः गां दोग्धि पयः। (वह गाय से दूध दुहता है।)
✨ शिष्यः गुरुं प्रश्नं पृच्छति। (शीष्य गुरु से प्रश्न पूछता है।)
✨ गोपालः धेनुं दुग्धं दोग्धि। (ग्वाला गाय से दूध दुहता है।)
✨ हरिः बलिं वसुधां याचते। (हरि बलि से पृथ्वी मांगते हैं।)
ग. अधिशींस्थासां कर्म
👉यदि शीङ् (सोना), स्था (ठहरना) और आस् (बैठना) धातुओं के पहले 'अधि' उपसर्ग लगा हो, तो उनके आधार की कर्म संज्ञा होती है और उसमें द्वितीया विभक्ति लगती है।
✨ हरिः वैकुंठं अधितिष्ठति। (हरि वैकुंठ में ठहरते हैं।)
✨राजा प्रासादं अधिशेते। (राजा महल में सोता है।)
✨ मुनिः शिलाम् अधिशेते। (मुनि शिला पर सोते हैं।)
✨राजा सिंहासनम् अधितिष्ठति। (राजा सिंहासन पर बैठता है।)
घ. अभिनिविशश्च
👉यदि 'विश' धातु से पहले 'अभि' और 'नि' दोनों उपसर्ग एक साथ जुड़े हों, तो उसके आधार में द्वितीया विभक्ति होती है।
✨ सः सन्मार्गम् अभिनिविशते। (वह अच्छे मार्ग पर चलता है।)
✨सन्तः सन्मार्गम् अभिनिविशन्ते। (सज्जन सन्मार्ग पर प्रवेश करते हैं।)
ङ. उपान्वध्याङ्वसः
👉यदि 'वस्' (रहना) धातु से पूर्व उप, अनु, अधि या आ उपसर्ग आए, तो रहने के स्थान (आधार) की कर्म संज्ञा होकर द्वितीया विभक्ति लगती है।
✨ मुनिः वनम् उपवसति। (मुनि वन के पास रहता है।)
✨ राजा नगरम् अनुवसति। (राजा नगर के पीछे रहता है।)
✨ राजा नगरम् उपवसति / अधिवसति / आवसति। (राजा नगर में रहता है।)
च. अभितः, परितः, समया, निकषा, हा, प्रति योगेऽपि
👉अभितः (दोनों ओर), परितः (चारों ओर), समया (समीप), निकषा (निकट), हा (शोक), प्रति (ओर) आदि शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति आती है।
✨ विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति। (विद्यालय के चारों ओर पेड़ हैं।)
✨नदीं उभयतः क्षेत्राणि सन्ति। (नदी के दोनों ओर खेत हैं।)
✨ ग्रामम् अभितः वनम् अस्ति। (गाँव के दोनों ओर वन है।)
✨ नगरं प्रति गच्छति। (वह नगर की ओर जाता है।)
छ. अन्तरा-अन्तरेण युक्ते
👉अन्तरा (बीच में) और अन्तरेण (बिना) शब्दों के संबंध में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है।
✨ त्वां मां च अन्तरा हरिः अस्ति। (तुम्हारे और मेरे बीच हरि हैं।)
✨ ज्ञानम् अन्तरेण न सुखम्। (ज्ञान के बिना सुख नहीं है।)
✨ अन्तरा त्वां मां न प्रवहति। (तुम्हारे और मेरे बीच नदी नहीं बहती।)
✨ संस्कृतम् अन्तरेण न किमपि जानामि। (संस्कृत के बिना और कुछ नहीं जानता।)
ज. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे
👉यदि किसी कालवाची (समय) या अध्ववाची (मार्ग) शब्द का क्रिया, गुण या द्रव्य के साथ निरंतर संबंध (लगातार होना) प्रकट हो, तो उस शब्द में द्वितीया विभक्ति होती है।
✨ सः क्रोशं गच्छति। (वह कोस भर जाता है - मार्गवाचक)
✨ छात्रः वर्षं पठति। (छात्र वर्ष भर पढ़ता है - कालवाचक)
✨ छात्रः मासम् अधीते। (छात्र महीने भर लगातार पढ़ता है।)
✨ क्रोशं कुटिला नदी। (कोस भर नदी टेढ़ी है।)
No comments:
Post a Comment