तृतीया विभक्ति (करण कारक)
नियम 1: साधकतमं करणम्
👉 परिभाषा: किसी भी काम या क्रिया को पूरा करने में जो साधन सबसे ज्यादा मदद करता है, उसे करण कहते हैं।
👉उदाहरण:
✨सः हस्तेन मिष्टान्नं वितरति। (वह हाथ से मिठाई बाँटता है।)
✨ बालकः कलमेन लिखति। (बालक कलम से लिखता है। )
✨छात्रः यानेन गच्छति। (छात्र गाड़ी से जाता है। )
नियम 2: कर्तृकरणयोस्तृतीया
👉परिभाषा: कर्मवाच्य और भाववाच्य वाक्य में जो मुख्य कर्ता नहीं होता (अनुक्त कर्ता) और जो काम करने का साधन (करण) होता है, उन दोनों में तृतीया विभक्ति लगती है।
👉 उदाहरण:
✨ सः कुठारेण वृक्षं छिनत्ति। (वह कुल्हाड़ी से पेड़ काटता है – करण में तृतीया)
✨ रामेण बालिः हतः। (राम के द्वारा बाली मारा गया – कर्ता में तृतीया)
✨ बालकः दण्डेन सर्पं हन्ति। (बालक डंडे से साँप को मारता है।)
✨ त्वं कलमेन पत्रं लिख। (तू कलम से पत्र लिख।)
✨ मोहनः दात्रेण लुनाति। (मोहन हँसिये से काटता है।)
✨ मया पुस्तकं पठ्यते। (मेरे द्वारा पुस्तक पढ़ी जाती है – कर्ता में तृतीया। – नया उदाहरण)
नियम 3: सहयुक्तेऽप्रधाने
👉परिभाषा: 'साथ' बताने वाले शब्दों जैसे—सह, साकम्, सार्धम्, समम् के आने पर वाक्य के गौण या कम महत्वपूर्ण व्यक्ति/वस्तु (अप्रधान) में तृतीया विभक्ति आती है।
👉उदाहरण:
✨ पुत्रेण सह आगतः पिता। (पुत्र के साथ पिता आया।)
✨ पिता पुत्रेण सह मेरठनगरं गतः। (पिता पुत्र के साथ मेरठ गया।)
✨ रामः जानक्या साकं गच्छति। (राम जानकी के साथ जाते हैं।)
✨ मोहनः गुरुणा सार्धं विद्यालयं गच्छति। (मोहन गुरु के साथ स्कूल जाता है।)
✨ लक्ष्मणेन समं रामः गच्छति। (लक्ष्मण के साथ राम जाते हैं।)
✨ सीता गीताया सह खेलति। (सीता गीता के साथ खेलती है। )
नियम 4: येनाङ्गविकारः
👉 परिभाषा: शरीर के जिस अंग में कोई खराबी या विकार साफ़ दिखाई दे, उस अंग को बताने वाले शब्द में तृतीया विभक्ति लगती है।
👉उदाहरण:
✨ अक्ष्णा काणः (आँख से काना)
✨ शिरसा खल्वाटः (सिर से गंजा)
✨ कर्णाभ्यां बधिरः (दोनों कानों से बहरा)
✨पादेन खञ्जः (पैर से लंगड़ा)
✨ पृष्ठेन कुब्जः (पीठ से कुबड़ा)
✨ नेत्रेण काणः छात्रः। (आँख से काना छात्र।)
नियम 5: पृथग्विना नानाभिस्तृतीयान्तरस्याम्
👉 परिभाषा: पृथक् (अलग), विना (बिना) और नाना (बिना/अलग) शब्दों के साथ विकल्प से तृतीया, द्वितीया या पञ्चमी विभक्ति में से कोई भी लगाई जा सकती है।
👉उदाहरण:
✨ जलेन / जलं / जलात् विना न जीवति कमलम्। (जल के बिना कमल जीवित नहीं रहता।)
✨ग्रामेण / ग्रामं / ग्रामात् पृथक्। (गाँव से अलग।)
✨ रामेण / रामं / रामात् विना। (राम के बिना।)
✨ ज्ञानेन / ज्ञानं / ज्ञानात् विना मुक्तिः न भवति। (ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं होती। )
चतुर्थी विभक्ति (सम्प्रदान कारक)
👉परिभाषा: दान या कोई चीज़ देने की क्रिया में जिसे कोई वस्तु हमेशा के लिए दी जाती है या जिसे खुश किया जाता है, वह सम्प्रदान होता है और उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।
👉 उदाहरण:
✨ राजा ब्राह्मणाय गां ददाति। (राजा ब्राह्मण को गाय देता है।)
✨माता बालकाय फलं ददाति। (माता बालक को फल देती है।)
✨ धनिकः निर्धनाय वस्त्रं ददाति। (अमीर गरीब को कपड़ा देता है।)
✨ भिक्षुकाय धनं देहि। (भिखारी को धन दो। )
नियम 3: रुच्यर्थानां प्रीयमाणः
👉परिभाषा: 'रुच्' (अच्छा लगना) धातु या इसी अर्थ वाली अन्य धातुओं के आने पर, जिस व्यक्ति को कोई चीज़ अच्छी लगती है, उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।
👉उदाहरण:
✨हरये रोचते भक्तिः। (हरि को भक्ति अच्छी लगती है।)
✨सुरेशाय दुग्धं रोचते। (सुरेश को दूध अच्छा लगता है।)
✨ मह्यं मोदकं रोचते। (मुझे लड्डू पसंद है।)
✨ बालकाय क्रीडनकं रोचते। (बालक को खिलौना अच्छा लगता है। )
नियम 4: क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः
👉 परिभाषा: क्रुध् (क्रोध), द्रुह् (द्रोह), ईर्ष्या (जलन) और असूया (कमियाँ निकालना) धातुओं के प्रयोग में जिसके ऊपर गुस्सा या द्रोह किया जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।
👉उदाहरण:
✨पिता पुत्राय क्रुध्यति। (पिता पुत्र पर गुस्सा करता है।)
✨ दुष्टाः सज्जनाय द्रुह्यन्ति। (दुष्ट लोग सज्जनों से द्रोह करते हैं।)
✨ कंसः कृष्णाय ईर्ष्यति। (कंस कृष्ण से ईर्ष्या करता है।)
✨ दैत्याः देवेभ्यः असूयन्ति। (दैत्य देवताओं से जलते हैं।)
✨ स्वामी सेवकाय क्रुध्यति। (मालिक नौकर पर क्रोध करता है।)
नियम 5: स्पृहेरीप्सितः
👉 परिभाषा: 'स्पृह्' (चाहना या इच्छा करना) धातु के आने पर, जिस वस्तु को सबसे ज्यादा चाहा जाए, उसमें चतुर्थी विभक्ति लगती है।
👉 उदाहरण:
✨ सा पुष्पेभ्यः स्पृहयति। (वह फूलों को चाहती है।)
✨ बालिकाः फलेभ्यः स्पृहयन्ति। (लड़कियाँ फलों की चाह रखती हैं।)
✨अहम् संस्कृताय स्पृहयामि। (मैं संस्कृत विषय को चाहता हूँ।)
✨ छात्रः पुस्तकाय स्पृहयति। (छात्र पुस्तक की इच्छा रखता है। )
👉 नियम 6: नमः स्वस्ति स्वाहा स्वधाऽलंवषड्योगाच्च
👉 परिभाषा: नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण हो), स्वाहा (देवताओं को आहुति), स्वधा (पितरों को आहुति) और अलम् (काफी/पर्याप्त) शब्दों के आने पर हमेशा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
👉 उदाहरण:
✨गणेशाय नमः / शिवाय नमः / विष्णवे नमः। (गणेश/शिव/विष्णु को नमस्कार।)
✨ तुभ्यं स्वस्ति। (तुम्हारा कल्याण हो।)
✨ अग्नये स्वाहा। (अग्नि देव के लिए स्वाहा।)
✨पितृभ्यः स्वधा। (पितरों के लिए स्वधा।)
✨ दैत्येभ्यः हरिः अलम्। (दैत्यों के लिए हरि काफी हैं।)
✨ गुरवे नमः। (गुरु को नमस्कार। )
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