पञ्चमी विभक्ति (अपादान कारक)
पहचान चिन्ह: से (अलग होने, डरने या तुलना के अर्थ में)
(क) ध्रुवमपायेऽपादानम् (1.4.24)
👉 परिभाषा: जब कोई वस्तु या व्यक्ति किसी निश्चित या स्थिर स्थान से अलग (पृथक) होती है, तो वह स्थिर बिंदु या आधार अपादान कहलाता है।
उदाहरण:
1. पत्राणि वृक्षात् पतन्ति। (पेड़ से पत्ते गिरते हैं) — यहाँ पेड़ स्थिर है जिससे पत्ते अलग हो रहे हैं, अतः 'वृक्षात्' में पञ्चमी है।
2. गंगा हिमालयात् प्रभवति। (गंगा हिमालय से निकलती/अलग होती है।)
(ख) अपादाने पञ्चमी (2.3.28)
👉 परिभाषा: जिसकी अपादान संज्ञा होती है (अर्थात जिससे कोई चीज अलग हो रही हो), उसमें अनिवार्य रूप से पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
1. सः गृहात् आगच्छति। (वह घर से आता है।)
(ग) जुगुप्सा-विराम-प्रमादार्थानामुपसंख्यानम् (वार्तिक)
👉 परिभाषा: जुगुप्सा (घृणा/नफ़रत करना), विराम (रुकना या हटना), और प्रमाद (आलस्य या भूल करना) अर्थ वाली धातुओं के साथ जिससे घृणा या आलस्य किया जाए, उसमें पञ्चमी विभक्ति लगती है।
👉 उदाहरण:
1. सज्जनः अधर्मात् विरमति। (सज्जन पुरुष अधर्म से रुकता/हठता है।)
2. छात्रः अध्ययनात् प्रमाद्यति। (छात्र पढ़ने में आलस्य करता है।)
(घ) भीत्रार्थानां भयहेतुः (1.4.25)
👉 परिभाषा: भी (डरना) और त्रा (रक्षा करना) अर्थ वाली धातुओं के प्रयोग में, जो डर या रक्षा का मूल कारण होता है (जिससे डर लगे या जिससे बचाया जाए), उसमें पञ्चमी विभक्ति लगती है।
👉 उदाहरण:
1. मृगः सिंहात् बिभेति। (हिरण शेर से डरता है) — यहाँ डर का कारण 'सिंह' है।
2. सैनिकः देशात् शत्रून् त्रायते। (सैनिक देश की शत्रुओं से रक्षा करता है।)
(ङ) आख्यातोपयोगे (1.4.29)
👉परिभाषा: जिससे नियमपूर्वक, लगातार कोई विद्या या नियम सीखा या पढ़ा जाता है, उस शिक्षक, गुरु या वक्ता में पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होता है।
उदाहरण:
1. शिष्यः आचार्यात् विद्यां गृह्णाति। (शिष्य आचार्य से विद्या सीखता है।)
2. अहं शिक्षकात् गणितं पठामि। (मैं शिक्षक से गणित पढ़ता हूँ।)
षष्ठी विभक्ति (सम्बन्ध)
पहचान चिन्ह: का, की, के, रा, री, रे (विशेष नोट: संस्कृत व्याकरण में सम्बन्ध को सीधा क्रिया से न जुड़े होने के कारण मुख्य 'कारक' नहीं माना जाता, केवल विभक्ति माना जाता है)
(क) षष्ठी शेषे
👉परिभाषा: कर्ता, कर्म, करण, अपादान आदि कारकों के नियमों से जो बच जाता है—यानी जहाँ केवल दो पदों के बीच स्वामित्व, स्वामी-सेवक भाव या पारिवारिक सम्बन्ध दिखाना हो, वहाँ षष्ठी विभक्ति का प्रयोग होता है।
👉 उदाहरण:
1. इदं कृष्णस्य पुस्तकम् अस्ति। (यह कृष्ण की किताब है।) — स्वामित्व सम्बन्ध।
2. दशरथस्य पुत्रः रामः आसीत्। (दशरथ के पुत्र राम थे।) — पारिवारिक सम्बन्ध।
(ख) षष्ठी हेतुप्रयोगे (2.3.36)
👉परिभाषा: जब किसी वाक्य में किसी कारण को प्रकट करने के लिए स्पष्ट रूप से 'हेतु' शब्द लिखा गया हो, तो उस कारण बताने वाले शब्द में और 'हेतु' शब्द में—दोनों में ही षष्ठी विभक्ति लगाई जाती है।
👉 उदाहरण:
1. अन्नस्य हेतोः वसति। (वह अन्न (भोजन) के कारण यहाँ रहता है।)
2. धनस्य हेतोः सः कार्यं करोति। (वह धन के कारण काम करता है।)
(ग) क्तस्य च वर्तमाने (2.3.67)
👉 परिभाषा: जब 'क्त' प्रत्यय का प्रयोग भूतकाल के लिए न होकर वर्तमान काल के अर्थ में किया जाता है, तब उस क्रिया के कर्ता (काम करने वाले) में षष्ठी विभक्ति लगाई जाती है।
👉उदाहरण:
1. राज्ञाम् पूजितः विद्वान्। (वह विद्वान, जो राजाओं द्वारा पूजा जाता है।)
2. सज्जनः सर्वस्य आदृतः। (सज्जन व्यक्ति सबका आदरणीय होता है / सब उसका आदर करते हैं।)
(घ) षष्ठी चानादरे (2.3.38)
👉 परिभाषा: जब किसी व्यक्ति या वस्तु का अनादर (तिरस्कार/उपेक्षा) करके कोई दूसरा काम किया जाता है, तो जिसका अनादर किया जा रहा है, उस शब्द में विकल्प से षष्ठी या सप्तमी दोनों विभक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है।
👉 उदाहरण:
1. रुदतः बालकस्य माता जगाम। (रोते हुए बालक को छोड़कर माँ चली गई — षष्ठी का प्रयोग)
2. रुदति बालके माता जगाम। (रोते हुए बालक को छोड़कर माँ चली गई — सप्तमी का प्रयोग)
सप्तमी विभक्ति (अधिकरण कारक)
पहचान चिन्ह: में, पर, पे
(क) आधारोऽधिकरणम्
👉 परिभाषा: कर्ता (काम करने वाला) और कर्म (जिस पर काम का फल पड़े) की क्रिया जिस स्थान, समय या विषय पर टिकी होती है, उस आधार को अधिकरण कहते हैं।
🎗️आधार तीन प्रकार के होते हैं:
1. औपश्लेषिक आधार (भौतिक जुड़ाव): जहाँ आधार और आधेय (वस्तु) का आपस में शारीरिक या भौतिक सम्बन्ध हो (जैसे किसी चीज़ पर बैठना या होना)।
उदाहरण: बालकः आसन्द्यां उपविशति। (बालक कुर्सी पर बैठता है।)
2. वैषयिक आधार (विषय से सम्बन्धित): जहाँ आधार कोई भौतिक स्थान न होकर कोई विषय, इच्छा या मानसिक भाव हो।
उदाहरण: छात्रस्य पठने अनुरागः अस्ति। (छात्र का पढ़ने में प्रेम/रुचि है।)
3. अभिव्यापक आधार (सर्वव्यापी): जब कोई वस्तु अपने आधार के कण-कण में पूरी तरह समाई हुई या व्याप्त हो।
👉 उदाहरण: सर्वस्मिन् ईश्वरोऽस्ति। (सभी में ईश्वर व्याप्त है।)
(ख) सप्तम्यधिकरणे च (2.3.36)
👉 परिभाषा: वाक्य में जिसकी भी अधिकरण संज्ञा (आधार) होती है, उसमें सप्तमी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।
👉 उदाहरण:
1. खगाः वृक्षे कूंजन्ति। (पक्षी पेड़ पर चहचहाते हैं।)
2. गृहे शांतिः अस्ति। (घर में शांति है।)
(ग) 'कुशल' तथा 'निपुण' शब्दों के योग में
👉 परिभाषा: जब वाक्य में कुशल, निपुण, प्रवीण या चतुर जैसे शब्द आएं (जो किसी कार्य में दक्षता दिखाते हैं), तो व्यक्ति जिस विषय या कार्य में कुशल होता है, उस शब्द में सप्तमी विभक्ति लगती है।
उदाहरण:
1. अर्जुनः धनुर्विद्यायां निपुणः आसीत्। (अर्जुन धनुर्विद्या में निपुण थे।)
2. लता गायने कुशला अस्ति। (लता गायन में कुशल है।)
(घ) साध्वसाधुप्रयोगे च (वार्तिक)
👉 परिभाषा: साधु (अच्छा/सज्जन व्यवहार) और असाधु (बुरा/दुर्जन व्यवहार) शब्दों के प्रयोग में, जिसके प्रति अच्छा या बुरा व्यवहार किया जाता है, उस शब्द में सप्तमी विभक्ति होती है।
उदाहरण:
1. श्रवणकुमारः पितरोः साधुः। (श्रवणकुमार माता-पिता के प्रति अच्छे थे।)
2. कंसः भगिनीं प्रति असाधुः आसीत्। (कंस बहन के प्रति दुष्ट/असाधु था — यहाँ 'भगिन्याम्' या विषय अर्थ में सप्तमी आएगी)।
(ङ) यतश्च निर्धारणम्
👉परिभाषा: जब किसी बहुत बड़े समुदाय (जाति, गुण, या क्रिया के आधार पर) में से किसी एक व्यक्ति, वस्तु या स्थान को सबसे श्रेष्ठ (उत्कृष्ट) या सबसे कमतर (अपकृष्ट) बताया जाता है, तो उस पूरे समुदाय वाचक शब्द में विकल्प से षष्ठी या सप्तमी विभक्ति लगाई जाती है।
👉उदाहरण:
1. कवीनां कालिदासः श्रेष्ठः। / कविषु कालिदासः श्रेष्ठः। (कवियों में कालिदास श्रेष्ठ हैं।)
2. पुष्पाणां कमलं सुन्दरतमम्। / पुष्पेषु कमलं सुन्दरतमम्। (फूलों में कमल सबसे सुंदर है।)
3. छात्राणां रमेशः पटुतमः। / छात्रेषु रमेशः पटुतमः। (छात्रों में रमेश सबसे चतुर है।)
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