. पर्यावरण एवं सतत विकास

 पर्यावरण पर प्रथम वैश्विक सम्मेलन: 5 जून 1972 (स्टॉकहोम, स्वीडन)।


प्रमुख संस्थान: NEERI (राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी शोध संस्थान) - नागपुर (CSIR की प्रयोगशाला)।


 सतत विकास (Sustainable Development):

परिभाषा: वर्तमान की जरूरतों को पूरा करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की क्षमताओं से समझौता न करना।

*ब्रंटलैंड रिपोर्ट (1987, नॉर्वे की प्रधानमंत्री): "आवर कॉमन फ्यूचर (Our Common Future)" शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में सतत विकास की सर्वप्रथ अवधारणा दी गई।

सतत विकास लक्ष्य (SDGs): संयुक्त राष्ट्र द्वारा 2030 तक का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।


Mission LiFE (Lifestyle for Environment):

"Pro Planet People" की अवधारणा पर आधारित।



 इसका उद्देश्य व्यक्तिगत और सामूहिक स्तर पर पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली को बढ़ावा देना है।


*जैव विविधता के प्रकार:

1. आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity): एक ही प्रजाति के भीतर जीन में विविधता।

2. प्रजाति विविधता: किसी क्षेत्र में विभिन्न प्रजातियों की संख्या।

3. पारिस्थितिक तंत्र विविधता।


महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ:

Endemic (स्थानिक प्रजाति):किसी विशिष्ट स्थान पर ही पाई जाने वाली विशेष प्रजाति।


*कीस्टोन प्रजाति (Keystone Species): पारिस्थितिकी तंत्र में महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाली प्रजाति (उदा. शेर, बाघ, हाथी)।

*जैव विविधता हॉटस्पॉट (Biodiversity Hotspots): नॉर्मन मायर्स (1988) द्वारा प्रतिपादित। मानक: कम से कम 1500 स्थानिक पौधे (संवहनी) होने चाहिए तथा अपने मूल आवास का 70% या अधिक नष्ट हो चुका हो।

संरक्षण के तरीके:

In-situ (स्व-स्थाने संरक्षण):प्रजातियों का उनके अपने प्राकृतिक आवास में संरक्षण (जैसे- नेशनल पार्क, वन्यजीव अभ्यारण्य, पवित्र उपवन)।

*Ex-situ (बाह्य-स्थाने संरक्षण): कृत्रिम आवासों में संरक्षण (जैसे- चिड़ियाघर, बॉटनिकल गार्डन)।

3. जलवायु परिवर्तन एवं वैश्विक संधियाँ

UNFCCC & Kyoto Protocol (क्योटो प्रोटोकॉल - 1997) ग्रीनहाउस गैसों (6 गैसों) के उत्सर्जन को कम करना। इसमें 'कार्बन क्रेडिट (COP-3)' की अवधारणा आई।


 समझौता (Paris Agreement - 2015 / COP 21): वैश्विक तापमान वृद्धि को   से नीचे (संभव हो तो   तक) सीमित करना।

*प्रमुख वैश्विक संगठन:IPCC (Intergovernmental Panel on Climate Change): स्थापना - 1988, मुख्यालय - जिनेवा।


SLCP (Short-Lived Climate Pollutants): अल्पकालिक जलवायु प्रदूषक (उदा. मीथेन, ब्लैक कार्बन, हाइड्रोफ्लोरोकार्बन)।

4. पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) एवं प्रदूषण नियंत्रण


पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986:*इसे 'Umbrella Act' (छाता अधिनियम) भी कहा जाता है।

EIA प्रक्रिया के चरण:

1. Screening (स्क्रीनिंग): परियोजना का वर्गीकरण (श्रेणी A और B)।


2. Scoping (स्कोपिंग):अध्ययन के लिए संदर्भ की शर्तें (TOR) तय करना।

3. Baseline Data Collection:परियोजना शुरू होने से पहले क्षेत्र की वर्तमान पर्यावरणीय स्थिति का डेटा जुटाना।


4. Public Consultation (लोक परामर्श): पारदर्शिता और स्थानीय लोगों की भागीदारी सुनिश्चित करना।


5. Post-Monitoring: परियोजना के बाद उसकी निगरानी करना।

*प्रदूषण के प्रकार व सूचक:

जल प्रदूषण: BOD (Biological Oxygen Demand) से जल प्रदूषण का परीक्षण किया जाता है। सुपोषण (Eutrophication) - जल निकाय में नाइट्रोजन और फास्फोरस की अधिकता से ऑक्सीजन की कमी होना।


ध्वनि प्रदूषण:नियंत्रण हेतु Green Muffler (सड़कों के किनारे पेड़ लगाना जो ध्वनि तरंगों को अवशोषित करते हैं) का उपयोग।


आपदा प्रबंधन (Disaster Management)


आपदा प्रबंधन अधिनियम, 2005: 23 दिसंबर 2005 को लागू।

 नोडल मंत्रालय: गृह मंत्रालय (MHA)।

त्रि-स्तरीय प्रशासनिक संरचना (राष्ट्रीय, राज्य, जिला):

NDMA:राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (अध्यक्ष: प्रधानमंत्री)।

SDMA: राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (अध्यक्ष: मुख्यमंत्री)।

DDMA: जिला आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (अध्यक्ष: जिलाधिकारी)।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन योजना (NDMP - 2016):

सेंडाइ फ्रेमवर्क (2015-2030): आपदा जोखिम को कम करने के लिए वैश्विक ढांचा।

Zero Casualty Approach (शून्य जनहानि दृष्टिकोण):** आपदा के दौरान जीवन रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।


Build Back Better: आपदा के बाद पुनर्निर्माण को पहले से अधिक मजबूत और सुरक्षित बनाना।


 अतिरिक्त महत्वपूर्ण टॉपिक (Added Topics)


ग्रीन इकॉनमी (Green Economy)


*परिचय: ग्रीन इकॉनमी वह अर्थव्यवस्था है जिसका उद्देश्य पर्यावरणीय जोखिमों और पारिस्थितिकीय scarcities (दुर्लभता) को काफी हद तक कम करते हुए सतत विकास को बढ़ावा देना है।

मुख्य विशेषताएँ:

कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषण में कमी लाना।

ऊर्जा और संसाधन दक्षता (Energy and Resource Efficiency) को बढ़ाना।

सामाजिक समावेश (Social Inclusion) को सुरक्षित रखना।



महत्व:यह परंपरागत 'ब्राउन इकॉनमी' (जो जीवाश्म ईंधन पर अत्यधिक निर्भर है) का विकल्प प्रदान करती है और नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर और पवन ऊर्जा) के उपयोग को प्रोत्साहित करती है।

इको-सेंसिटिव जोन (Eco-Sensitive Zones - ESZ)

परिचय:इको-सेंसिटिव जोन ऐसे क्षेत्र हैं जिन्हें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा संरक्षित क्षेत्रों (नेशनल पार्क और वन्यजीव अभ्यारण्यों) के आसपास के 10 किलोमीटर के दायरे तक अधिसूचित किया जाता है।

उद्देश्य: संरक्षित क्षेत्रों में संवेदनशील वन्यजीवों और वनस्पतियों को मानवीय गतिविधियों (जैसे खनन, बड़े उद्योगों, व्यावसायिक निर्माण) के नकारात्मक प्रभावों से बचाना "शॉक ऑब्जर्वर (Shock Absorber)" के रूप में कार्य करना है।

*विनियमन: इन क्षेत्रों में गतिविधियों को विनियमित किया जाता है—कुछ गतिविधियाँ पूरी तरह प्रतिबंधित होती हैं (जैसे वाणिज्यिक खनन, सॉ मिल), जबकि कुछ को अनुमति होती है (जैसे कृषि पद्धतियाँ, पर्यावरण-अनुकूल पर्यटन)।