To be continued....
👉'ह' वर्ण का दो बार ग्रहण क्यों? :-
✨'अट्' और 'शल्' प्रत्याहारों में 'ह' वर्ण को शामिल करने तथा 'अहेण' और 'अधुक्षत्' जैसे विशिष्ट प्रयोगों की सिद्धि के लिए माहेश्वर सूत्रों में 'ह' दो बार आया है।
👉माहेश्वर सूत्रों में 'ण' इत्संज्ञक वर्ण दो बार आया है- एक बार अइउण् में दूसरी बार लण् में।
इत्संज्ञा और लोप करने वाले प्रमुख सूत्र
👉हलन्त्यम् (1.3.3): उपदेश की अवस्था में जो अन्तिम हल् (व्यंजन) होता है, उसकी इत्संज्ञा होती है।
👉तस्य लोपः जिस वर्ण की इत्संज्ञा होती है, उसका लोप हो जाता है। उदाहरण के लिए, 'अइउण्' में 'ण्' की और 'ऋऌक्' में 'क्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर 'तस्य लोपः' से लोप हो जाता है।
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उपदेश क्या है?: "उपदेश आद्योच्चारणम्" अर्थात् पाणिनी, कात्यायन और पतंजलि (मुनित्रय) ने व्याकरणशास्त्र में जिसका प्रथम उच्चारण या प्रथम पाठ किया, उसे उपदेश कहा जाता है।
प्रत्याहार संज्ञा विधायक सूत्र
👉आदिरन्त्येन सहेता (1.1.71): अन्त्य इत् वर्ण के साथ जो आदि वर्ण है, वह मध्यगामी सभी वर्णों का बोध कराता हुआ स्वयं का भी बोध कराता है।उदाहरण: 'अण्' प्रत्याहार 'अइउण्' सूत्र के 'अ' से लेकर इत्संज्ञक वर्ण 'ण्' से मिलकर बनता है, जिसमें अ, इ, उ ये तीन वर्ण आते हैं।
प्रत्याहारों की संख्या और वर्गीकरणकुल संख्या:
👉संस्कृत व्याकरण में कुल 42 प्रत्याहार होते हैं। (कुछ विद्वान 'रँ' और 'यम्' को मानकर इनकी संख्या 43 या 44 भी बताते हैं)।
🟥अच् प्रत्याहार (स्वर): इसमें समस्त 9 स्वर वर्ण आते हैं, इसलिए स्वरों को "अच्" भी कहा जाता है।
🟩हल् प्रत्याहार (व्यंजन): इसमें समस्त 33 व्यंजन वर्ण आते हैं, इसलिए व्यंजनों को "हल्" भी कहा जाता है।
🟧शल् प्रत्याहार: इसमें चारों ऊष्म वर्ण (श, ष, स, ह) आते हैं।
🟪यण् प्रत्याहार: इसमें चारों अन्तःस्थ वर्ण (य, व, र, ल) आते हैं।

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