माहेश्वर सूत्र 

👉 कुल 14 माहेश्वर सूत्र


🟥प्रत्येक सूत्र का जो अंतिम वर्ण है, उस पर हलन्त (्) लगा है (जैसे- ण, क, ङ, च आदि)। इन्हें 'इत्' वर्ण कहते हैं। 

👉इनका उपयोग केवल शॉर्टफॉर्म (प्रत्याहार) बनाने के लिए होता है, वर्णों की गिनती करते समय इन्हें छोड़ दिया जाता है।


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माहेश्वर सूत्र के बारे में :- 


माहेश्वर सूत्र की उत्पत्ति और अन्य नामउत्पत्ति: 


👉महर्षि पाणिनि की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान महेश्वर (शिव) ने नृत्य के अवसान (समाप्ति) पर 14 बार डमरू बजाया, जिससे ये 14 सूत्र प्रकट हुए।


🟥प्रसिद्ध श्लोक:


 "नृत्तावसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपञ्चवारम्..."


✨ अर्थात नटराज शिव ने सनकादि सिद्धों के उद्धार की कामना से 14 (नव + पञ्च) बार डमरू बजाया ✨


🟩अन्य नाम: इन सूत्रों को चतुर्दशसूत्र, प्रत्याहारसूत्र, शिवसूत्र और वर्णसमाम्नायसूत्र भी कहा जाता है।


माहेश्वर सूत्रों के विषय में ज्ञातव्य तथ्य (महत्वपूर्ण नियम)वर्णों का वैज्ञानिक क्रम: 


👉सूत्रों में सबसे पहले स्वर हैं, उसके बाद अन्तःस्थ वर्ण (य व र ल) हैं। इसके बाद व्यंजनों के पंचम वर्ण (7वां सूत्र), चतुर्थ वर्ण (8वां और 9वां सूत्र), तृतीय वर्ण (10वां सूत्र), द्वितीय वर्ण और प्रथम वर्ण आते हैं। सबसे अंत में ऊष्म वर्ण (श ष स ह) दिए गए हैं।


👉इत्-संज्ञा और लोप: इन 14 सूत्रों के अंत में आने वाले हलन्त वर्ण (जैसे—ण, क, ङ, च आदि) 'इत्' संज्ञक कहलाते हैं। सूत्रों के अनुसार इन इत् संज्ञक वर्णों का लोप हो जाता है, अर्थात प्रत्याहार बनाते समय इनके बीच के वर्ण तो गिने जाते हैं, लेकिन इन्हें छोड़ दिया जाता है।


👉कुल इत्-संज्ञक वर्ण: कुल इत्-संज्ञक वर्णों की संख्या 14 होती है। (कुछ विशेष परिस्थितियों में 'लण्' सूत्र के अकार की इत्-संज्ञा मानकर इसे 15 भी कहा जाता है)। 'अनुबन्ध' और 'इत्' दोनों एक ही के पर्यायवाची हैं।


👉'अच्' (स्वर) की संख्या: पहले चार सूत्रों (अइउण् से लेकर ऐऔच् तक) से 'अच्' प्रत्याहार बनता है। इसमें आने वाले इत् वर्णों (ण, क, ङ, च) को छोड़कर कुल 9 स्वर (अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ) आते हैं।


👉'ह' वर्ण की आवृत्ति: 5वें सूत्र 'हयवरट्' में भी 'ह' आता है और 14वें सूत्र 'हल्' में भी 'ह' आता है। अतः माहेश्वर सूत्रों

 में 'ह' वर्ण की गिनती दो बार की गई है।